नगर निगम चुनाव से पहले महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल
सीट शेयरिंग, सियासी पुनर्मिलन और टूटते–जुड़ते गठबंधन
महाराष्ट्र में जनवरी 2026 में होने वाले नगर निगम चुनाव अब केवल स्थानीय निकायों की सत्ता तक सीमित नहीं रह गए हैं। बीएमसी, पुणे, पिंपरी-चिंचवड जैसे शहरी किलों पर कब्ज़ा 2029 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों की दिशा तय करेगा। यही वजह है कि इन चुनावों से करीब एक साल पहले ही राज्य की राजनीति में जबरदस्त हलचल दिखाई देने लगी है।
सत्ताधारी महायुति भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) आज मुंबई में एक अहम बैठक करने जा रही है। यह बैठक सिर्फ औपचारिक समन्वय तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में सीट शेयरिंग, वार्ड-स्तरीय समीकरण और नेतृत्व की दावेदारी है।
दादर स्थित भाजपा कार्यालय में होने वाली इस बैठक में भाजपा की ओर से मुंबई अध्यक्ष अमित सतम, चुनाव प्रभारी आशीष शेलार, विधायक अतुल भाटखालकर और प्रवीण दरेकर मौजूद रहेंगे। वहीं शिवसेना की तरफ से उदय सामंत, राहुल शेवाले और प्रकाश सर्वे शामिल होंगे।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस रणनीति में अजीत पवार की एनसीपी को जगह मिलेगी या फिर वह केवल “सहयोगी” बनकर रह जाएगी?
महायुति के भीतर यह असंतुलन अब खुलकर सामने आने लगा है।
मुंबई महानगरपालिका केवल नगर निगम नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति का “पावर सेंटर” मानी जाती है। बीएमसी का बजट कई राज्यों के बराबर है और यहां जीत सत्ता से ज्यादा राजनीतिक वैधता देती है।
भाजपा बीएमसी पर पहली बार सीधे कब्जा जमाना चाहती है, जबकि शिवसेना के लिए यह उसकी राजनीतिक पहचान का सवाल है। ऐसे में सीटों का बंटवारा महायुति के लिए सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा बन गया है।
राज्य की राजनीति में इस वक्त सबसे दिलचस्प घटनाक्रम पुणे और पिंपरी-चिंचवड से सामने आ रहा है। लंबे समय से अलग-अलग खेमों में खड़ी एनसीपी के दोनों धड़े अजीत पवार और शरद पवार अब नगर निगम चुनावों में साथ आने की संभावना तलाश रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार दोनों गुटों के नेताओं के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है और माहौल सकारात्मक है। अगर यह गठबंधन जमीन पर उतरता है, तो यह एनसीपी के विभाजन के बाद सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश होगा।
जहां अजीत पवार शहरी राजनीति में व्यावहारिक गठबंधन की तलाश में हैं, वहीं शरद पवार गुट राजनीतिक और वैचारिक संतुलन को प्राथमिकता दे रहा है।
शरद पवार गुट अभी यह तय करने में जुटा है कि वह कांग्रेस के साथ जाए या शिवसेना (यूबीटी) के साथ। आज मुंबई में सुप्रिया सुले और वरिष्ठ नेताओं की बैठक इसी दिशा में निर्णायक मानी जा रही है।
पुणे में भाजपा के खिलाफ एक व्यापक मोर्चे की पटकथा भी लिखी जा रही है। महा विकास अघाड़ी, मनसे और एनसीपी के बीच संभावित तालमेल पर अनौपचारिक बातचीत चल रही है।
खबरों के मुताबिक अजीत पवार ने कांग्रेस नेता सतेज पाटिल से संपर्क किया था, ताकि कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की संभावनाएं टटोली जा सकें। हालांकि फिलहाल यह बातचीत ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच पाई है।
महायुति के भीतर एनसीपी की भूमिका लगातार सवालों के घेरे में है। सत्ता में हिस्सेदारी के बावजूद पार्टी को न तो निर्णायक भूमिका मिलती दिख रही है और न ही सीट शेयरिंग में स्पष्ट स्थिति।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भाजपा-शिवसेना की सीधी बातचीत इस बात का संकेत है कि एनसीपी को “स्वाभाविक सहयोगी” नहीं, बल्कि “समझौते की मजबूरी” के रूप में देखा जा रहा है।
15 जनवरी 2026 को मतदान और 17 जनवरी को मतगणना होगी, लेकिन इसके नतीजे केवल नगर निगमों तक सीमित नहीं रहेंगे।
यह तय करेंगे कि
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क्या महायुति सच में एकजुट है?
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क्या एनसीपी का पुनर्मिलन संभव है?
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और क्या विपक्ष शहरी इलाकों में भाजपा को चुनौती दे पाएगा?
महाराष्ट्र की राजनीति इस वक्त गठबंधन, अविश्वास और नए प्रयोगों के दौर से गुजर रही है। हर बैठक, हर बयान और हर चुप्पी आने वाले बड़े राजनीतिक बदलाव की भूमिका लिख रही है।
नगर निगम चुनाव अब सिर्फ स्थानीय सरकार चुनने का माध्यम नहीं, बल्कि राज्य की सत्ता की दिशा तय करने वाला बड़ा रणक्षेत्र बन चुका है।
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