‘चुनावी लूट’ का नारा, जनादेश और लोकतंत्र की असली परीक्षा
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने केवल सत्ता परिवर्तन का रास्ता नहीं खोला, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, चुनावी संस्थाओं और राजनीतिक मर्यादाओं को लेकर एक नई बहस भी खड़ी कर दी है। चुनाव में करारी हार का सामना करने वाली Mamata Banerjee ने परिणामों को स्वीकार करने के बजाय “चुनावी लूट” का आरोप लगाते हुए कहा कि उनकी पार्टी की लगभग 100 सीटें जबरन छीनी गईं। उन्होंने चुनाव आयोग की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए और यहां तक आरोप लगाया कि मतगणना केंद्र में उनके साथ धक्का-मुक्की और दुर्व्यवहार किया गया। ममता बनर्जी का कहना है कि यह केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि लोकतंत्र की हत्या है। दूसरी ओर भाजपा और उसके समर्थक इन आरोपों को जनादेश स्वीकार न कर पाने की राजनीतिक प्रतिक्रिया बता रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि चुनावी हार के बाद संस्थाओं पर अविश्वास जताने की राजनीति क्या भारतीय लोकतंत्र को कमजोर कर रही है?
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी चुनाव प्रक्रिया और शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण की परंपरा रही है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत की पहचान इस बात से बनी कि यहां करोड़ों लोग मतदान करते हैं, सरकारें बदलती हैं और सत्ता का हस्तांतरण संवैधानिक प्रक्रिया के तहत होता है। यही वजह है कि चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता लोकतंत्र की रीढ़ मानी जाती है। जब कोई बड़ा राजनीतिक नेता चुनाव परिणामों को “लूट” कहता है, तो उसका असर केवल एक चुनाव तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जनता के मन में पूरी चुनावी व्यवस्था को लेकर संदेह पैदा होने लगता है। लोकतंत्र में विपक्ष को सवाल उठाने का पूरा अधिकार है, लेकिन उन सवालों का आधार प्रमाण, तथ्य और संवैधानिक प्रक्रिया होनी चाहिए। केवल राजनीतिक बयानबाजी के जरिए पूरे चुनावी तंत्र को कठघरे में खड़ा करना लोकतांत्रिक विश्वास को कमजोर कर सकता है।
ममता बनर्जी का राजनीतिक जीवन हमेशा संघर्ष और टकराव की राजनीति से जुड़ा रहा है। उन्होंने वामपंथी शासन के लंबे दौर को चुनौती देकर बंगाल की सत्ता हासिल की थी। सड़क से लेकर संसद तक संघर्ष करना उनकी राजनीतिक शैली का हिस्सा रहा है। यही कारण है कि हार के बाद भी उन्होंने राजनीतिक प्रतिरोध का रास्ता चुना है। लेकिन लोकतंत्र में संघर्ष और संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास—इन दोनों के बीच एक महीन लेकिन महत्वपूर्ण अंतर होता है। यदि किसी दल को लगता है कि चुनाव में गड़बड़ी हुई है, तो उसके लिए कानूनी रास्ते खुले हैं। चुनाव याचिकाएं दाखिल की जा सकती हैं, अदालत में चुनौती दी जा सकती है और चुनाव आयोग के समक्ष तथ्य रखे जा सकते हैं। भारत का संविधान ऐसे सभी विवादों के समाधान की व्यवस्था देता है। इसलिए केवल सार्वजनिक मंचों से “चुनावी लूट” का नारा देना राजनीतिक रूप से भले प्रभावी लगे, लेकिन संवैधानिक दृष्टि से यह पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारतीय राजनीति में चुनावी हार को स्वीकार करने की एक मजबूत परंपरा रही है। देश में कई बड़े नेता और दल चुनावों में पराजित हुए, लेकिन उन्होंने जनादेश को स्वीकार किया। केंद्र में सरकारें बदलीं, राज्यों में भी सत्ता परिवर्तन हुए, लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर विश्वास बना रहा। यही भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता की पहचान है। पूर्व प्रधानमंत्रियों से लेकर मुख्यमंत्रियों तक ने चुनावी हार के बाद पद छोड़ा और विपक्ष की भूमिका निभाई। लोकतंत्र की असली सुंदरता यही है कि सत्ता स्थायी नहीं होती और जनता समय-समय पर अपना फैसला बदलती रहती है।
हालांकि इस पूरे विवाद का दूसरा पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान मतदाता सूची, नागरिकता सत्यापन और लाखों मतदाताओं के नामों को लेकर लगातार विवाद सामने आए। कुछ राजनीतिक दलों ने आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में लोगों के मताधिकार प्रभावित हुए। यदि वास्तव में ऐसा हुआ है तो यह बेहद गंभीर विषय है। लोकतंत्र में हर नागरिक का वोट सबसे महत्वपूर्ण अधिकार माना जाता है। यदि किसी भी स्तर पर मतदाताओं को वोट देने से रोका गया या उनके नाम सूची से हटाए गए, तो उसकी निष्पक्ष और पारदर्शी जांच जरूरी है। लेकिन यह लड़ाई भावनात्मक नारों से नहीं, बल्कि दस्तावेजों, आंकड़ों और कानूनी प्रक्रिया के जरिए अधिक मजबूती से लड़ी जा सकती है।
दिलचस्प यह भी है कि चुनाव प्रचार के दौरान जो विपक्षी दल ममता बनर्जी की राजनीति की आलोचना कर रहे थे, अब वही उनके समर्थन में खड़े दिखाई दे रहे हैं। Rahul Gandhi ने चुनाव के दौरान बंगाल में भाजपा की बढ़त के लिए ममता की ध्रुवीकरण वाली राजनीति को जिम्मेदार ठहराया था, लेकिन अब “चुनावी लूट” के मुद्दे पर दोनों एक साथ खड़े नजर आ रहे हैं। Akhilesh Yadav, Uddhav Thackeray, Arvind Kejriwal और अन्य विपक्षी नेताओं ने भी चुनाव परिणामों पर सवाल उठाने की राजनीति को समर्थन दिया है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारतीय राजनीति में चुनावी हार के बाद संस्थाओं पर सवाल उठाना धीरे-धीरे एक सामान्य रणनीति बनती जा रही है।
संविधान के अनुसार किसी भी राज्य में वही सरकार बनाती है जिसे विधानसभा में बहुमत प्राप्त हो। पश्चिम बंगाल विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। राज्यपाल की भूमिका, प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति और विधायकों के शपथ ग्रहण जैसी संवैधानिक प्रक्रियाएं इसी व्यवस्था का हिस्सा हैं। किसी भी निवर्तमान मुख्यमंत्री का पद पर बने रहना जनादेश और सदन के बहुमत पर निर्भर करता है, न कि राजनीतिक घोषणा पर। यही संवैधानिक मर्यादा है और यही लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बुनियाद भी।
दरअसल लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं, बल्कि हार को स्वीकार करने की राजनीतिक परिपक्वता भी उसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। विपक्ष का काम सवाल उठाना, सरकार को चुनौती देना और जनता के मुद्दों को सामने लाना है, लेकिन लोकतंत्र की मजबूती तभी बनी रहती है जब राजनीतिक दल संवैधानिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा बनाए रखें। यदि हर चुनावी हार के बाद “वोट चोरी”, “ईवीएम गड़बड़ी” या “चुनावी लूट” जैसे आरोप सामान्य राजनीतिक भाषा बन जाएंगे, तो धीरे-धीरे जनता का विश्वास पूरी चुनावी व्यवस्था से डगमगाने लगेगा। यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरनाक मानी जाती है।
भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में लोकतंत्र केवल संविधान की व्यवस्था नहीं, बल्कि जनता की आस्था भी है। चुनाव आयोग, न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता इसी आस्था पर टिकी है। यदि किसी चुनाव में वास्तव में गड़बड़ी हुई है तो उसे कानूनी रूप से चुनौती देना ही सबसे मजबूत और प्रभावी रास्ता है। लेकिन यदि चुनावी हार को केवल राजनीतिक नारे में बदल दिया जाए, तो इससे लोकतंत्र की जड़ों में अविश्वास पैदा होता है। आखिरकार जनता का फैसला ही लोकतंत्र में सर्वोपरि होता है। जनता कभी किसी को सत्ता देती है और कभी विपक्ष में बैठाती है। यही लोकतंत्र की असली शक्ति और सुंदरता है।
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