सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान के बाद भी नहीं थम रहा अवैध निर्माण का खेल, फर्जी सुपरवाइजर के जरिए एमवीडीए में वसूली
मथुरा। सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान लेने और प्राधिकरण से हलफनामा तलब किए जाने के बाद भी मथुरा वृंदावन विकास प्राधिकरण (एमवीडीए) में अवैध निर्माणों का खेल थमने का नाम नहीं ले रहा है। उल्टा, कार्रवाई की औपचारिकता निभाकर अंदरखाने निर्माण जारी रखने और उससे वसूली करने की खबरें सामने आ रही हैं। सूत्रों के अनुसार प्राधिकरण द्वारा जिन निर्माणों को सील किया गया है, उनमें से कई स्थानों पर बाहर से सील जस की तस दिखती है, लेकिन अंदर तेजी से फिनिशिंग और निर्माण कार्य चलता रहता है। बताया जा रहा है कि इस “सील के अंदर निर्माण” के खेल में लाखों रुपये का लेन-देन हो रहा है, जो कथित रूप से प्राधिकरण के अलग-अलग स्तरों तक पहुंचता है।
यमुनापार क्षेत्र का एक मामला विशेष रूप से चर्चा में है, जहां एक बड़े अवैध निर्माण पर कार्रवाई के बावजूद निर्माण लगभग पूर्ण होने की स्थिति में पहुंच चुका है। सूत्रों का दावा है कि संबंधित अधिकारियों की मौन सहमति के बिना ऐसा संभव नहीं है। सूत्रों से मिली जानकारी में बताया गया है कि कार्रवाई दिखाने के लिए सील लगा दी जाती है, लेकिन बाद में “सेटिंग” के जरिए काम जारी रखने की छूट दे दी जाती है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या अवैध निर्माणों पर की जा रही कार्रवाई महज दिखावा बनकर रह गई है।
इस पूरे मामले में “कंपाउंडिंग” को भी एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाता है। बताया जाता है कि प्राधिकरण के कुछ अधिकारी अवैध निर्माण करने वालों को कंपाउंडिंग के लिए आवेदन करने की सलाह देते हैं। इसके बाद फाइल की प्रक्रिया को जानबूझकर लंबित रखा जाता है, जिससे निर्माणकर्ता को पर्याप्त समय मिल जाता है और वह इस बीच पूरा निर्माण खड़ा कर लेता है। इस तरह नियमों की आड़ में नियमों को ही दरकिनार किया जा रहा है।
सबसे गंभीर और चौंकाने वाली खबर वसूली के तरीके को लेकर है। “सूत्रों के अनुसार, एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नियुक्ति मूल रूप से कार्यालयी कार्यों के लिए की गई है, जिसमें अधिकारियों द्वारा घंटी बजाए जाने पर उनके कक्ष में उपस्थित होना और दिए गए निर्देशों का पालन करना शामिल है। यानी उसकी भूमिका पूरी तरह से आंतरिक कार्यालय व्यवस्था तक सीमित है। लेकिन खबर है कि इसी कर्मचारी को निर्धारित दायित्वों से हटाकर फील्ड में ‘कथित सुपरवाइजर’ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह स्थिति अपने आप में गंभीर सवाल खड़े करती है कि आखिर एक ऐसा कर्मचारी, जिसकी नियुक्ति केवल अधिकारियों के बुलावे पर सेवा देने के लिए हुई है, वह किस आदेश और किस अधिकार के तहत अवैध निर्माण स्थलों पर निगरानी और कथित वसूली जैसे कार्यों में लगाया जा रहा है।” यह कर्मचारी अवैध निर्माण करने वालों से संपर्क करता है, उन्हें कार्रवाई का डर दिखाता है और फिर “मामला सेट” कराने के नाम पर पैसे की मांग करता है। बताया जा रहा है कि कई मामलों में वह मोबाइल फोन के माध्यम से धमकी भरे कॉल भी कराता है, जबकि अधिकारी खुद सीधे सामने नहीं आते। इस पूरे तंत्र के पीछे अधिकारियों की भूमिका होने के खबरें सामने आ रही हैं। जिससे वे खुद को बचाए रखते हुए वसूली का खेल जारी रख सकें।
सवाल यह भी खड़ा होता है कि जो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी कार्यालय में घंटी बजने पर अधिकारियों के आदेश लेने के लिए नियुक्त हुआ हो, वह आखिर किसके इशारे पर अवैध निर्माण स्वामियों का “घंटा” बजा रहा है और उस “घंटे की आवाज” को क्षेत्रीय अभियंताओं की जेब तक पहुंचा रहा है। यह स्थिति न केवल प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी गंभीर संदेह पैदा करती है।
यहां सवाल यह है कि क्या प्राधिकरण में जिम्मेदार पदों पर बैठे सचिव व उपाध्यक्ष को इस गतिविधि की जानकारी नहीं है, या फिर उनकी मौन सहमति से यह सब हो रहा है? जब एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी क्षेत्र में जाकर “सुपरविजन” कर रहा है, तो उसके वास्तविक दायित्वों का निर्वहन कौन कर रहा है? और क्या यह पूरा तंत्र एक सुनियोजित तरीके से संचालित हो रहा है?
खबर प्रकाशित करने से पहले जब प्राधिकरण के सचिव आशीष कुमार से दूरभाष पर संपर्क कर उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने स्वयं को न्यायालय में व्यस्त बताया। ऐसे में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मथुरा वृंदावन विकास प्राधिकरण इन गंभीर आरोपों पर क्या कदम उठाता है और क्या वास्तव में अवैध निर्माणों पर सख्ती दिखाई जाएगी, या फिर वसूली और अनियमितताओं का यह सिलसिला यूं ही जारी रहेगा।
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