बांग्लादेश में हिंदू एक हैं, फिर भी सुरक्षित क्यों नहीं?
बांग्लादेश में हिंदू युवक दीपु चंद्र दास की सरेआम हत्या ने एक बार फिर पूरे उपमहाद्वीप के हिंदुओं को झकझोर दिया है। भारत में गुस्सा है, आक्रोश है, सड़कों पर प्रदर्शन हैं और सोशल मीडिया पर दोषियों के लिए फांसी की मांग है। यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। किसी भी सभ्य समाज में यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति को केवल उसके धर्म के कारण मार दिया जाए।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह गुस्सा काफी है? क्या यह आक्रोश बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित कर देगा? या फिर हम हर बार की तरह शोक और रोष जताकर अगले हादसे का इंतजार करेंगे?
सबसे पहले एक झूठे और खतरनाक भ्रम को तोड़ना जरूरी है। बार-बार कहा जाता है कि बांग्लादेश में हिंदू आपस में बंटे हुए हैं, इसलिए निशाने पर हैं। यह दावा तथ्यों के साथ धोखा है। बांग्लादेश के हिंदू सामाजिक रूप से बंटे नहीं हैं। वे अपने अस्तित्व के संकट में एकजुट हैं, फिर भी असुरक्षित हैं। इसका कारण उनकी कथित फूट नहीं, बल्कि उनकी घटती हुई संख्या है।
इतिहास इस सच का कठोर साक्षी है कि जहां-जहां हिंदू अल्पसंख्यक हुए, वहां-वहां उनकी सुरक्षा पहले कमजोर हुई और फिर लगभग समाप्त हो गई। यह भावनात्मक बयान नहीं, बल्कि ऐतिहासिक तथ्य है।
आंकड़े, जो भावनाओं से ज्यादा निर्मम होते हैं
यदि हम केवल बांग्लादेश को देखें, तो तस्वीर और भी भयावह हो जाती है। 1951 में, जब बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान था, तब वहां हिंदू आबादी लगभग 22 प्रतिशत थी। 1971 में बांग्लादेश के गठन के समय यह घटकर लगभग 13–14 प्रतिशत रह गई। 1991 में यह संख्या 11 प्रतिशत के आसपास पहुंची, 2001 में 9.2 प्रतिशत और आज विभिन्न सरकारी व स्वतंत्र अनुमानों के अनुसार 8–9 प्रतिशत से भी कम मानी जाती है।
यानी सात दशकों में हिंदू आबादी आधे से भी कम रह गई। यह गिरावट किसी प्राकृतिक जनसांख्यिकीय परिवर्तन का परिणाम नहीं है। इसके पीछे दंगे, लक्षित हिंसा, जमीनों पर कब्जा, जबरन पलायन, धार्मिक उत्पीड़न और राज्य की लगातार निष्क्रियता रही है। जब कोई समुदाय राजनीतिक रूप से कमजोर हो जाता है, तो उसके खिलाफ अपराध “घटना” नहीं रहते, वे “सिस्टम” का हिस्सा बन जाते हैं।
यही कारण है कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले करने वालों को अक्सर सजा नहीं मिलती। जब संख्या कम होती है, तो वोट बैंक कमजोर होता है। जब वोट बैंक कमजोर होता है, तो राजनीतिक इच्छाशक्ति भी कमजोर हो जाती है। और जब राजनीतिक इच्छाशक्ति खत्म हो जाती है, तो न्याय भी कागजों तक सिमट जाता है।
आज हिंदू समाज को यह समझाया जा रहा है कि संख्या का कोई महत्व नहीं, सिर्फ एकता जरूरी है। यह बात सुनने में नैतिक लगती है, लेकिन व्यवहार में यह आधा सच है, और आधा सच कई बार पूरे झूठ से ज्यादा खतरनाक होता है। एकता आवश्यक है, इसमें कोई संदेह नहीं, लेकिन संख्या के बिना एकता भी असहाय हो जाती है। बांग्लादेश के हिंदू इसका जीवित प्रमाण हैं। वे संगठित हैं, फिर भी मजबूर हैं। वे एक हैं, फिर भी भय में जी रहे हैं।
अब आईना भारत की ओर मोड़िए
भारत आज भी दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां हिंदू बहुसंख्यक हैं। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि भविष्य पूरी तरह सुरक्षित है? अगर हम ईमानदारी से आंकड़ों को देखें, तो तस्वीर उतनी सरल नहीं है। 1951 में भारत में हिंदू आबादी 84 प्रतिशत से अधिक थी। 2011 की जनगणना में यह घटकर 79.8 प्रतिशत रह गई। संख्या बढ़ी है, लेकिन अनुपात घटा है।
इतिहास बताता है कि कुल संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण अनुपात होता है। जनसंख्या का अनुपात केवल आंकड़ा नहीं होता, वह सामाजिक और राजनीतिक दिशा तय करता है। जो समाज अपने जनसांख्यिकीय भविष्य को हल्के में लेता है, वह धीरे-धीरे सांस्कृतिक रूप से कमजोर होता है, सामाजिक रूप से बिखरता है और अंततः राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक हो जाता है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आज भारत के हिंदू बांग्लादेश के हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों को देखकर दुख तो जताते हैं, लेकिन अपने समाज के भीतर चल रही प्रक्रियाओं पर आंख मूंदे बैठे हैं। परिवार संस्था कमजोर हो रही है, विवाह और संतान को बोझ बताया जा रहा है, सांस्कृतिक निरंतरता को पिछड़ेपन का नाम दिया जा रहा है और भविष्य की चिंता को “कट्टर सोच” कहकर खारिज किया जा रहा है।
हम दूर की आग देखकर चीखते हैं, लेकिन अपने आंगन में सुलगती चिंगारी को नजरअंदाज कर देते हैं।
इतिहास चेतावनी नहीं देता, उदाहरण छोड़ता है
अफगानिस्तान में आज हिंदू और सिख लगभग इतिहास बन चुके हैं। पाकिस्तान में हिंदू आबादी 2 प्रतिशत से भी कम रह गई है। बांग्लादेश उसी रास्ते पर तेजी से बढ़ता दिख रहा है। हर जगह कहानी एक जैसी है—पहले संख्या घटी, फिर प्रभाव खत्म हुआ और अंत में सुरक्षा भी।
आज जरूरत भावनात्मक नारों, सोशल मीडिया अभियानों और क्षणिक आक्रोश की नहीं है। जरूरत है गंभीर, निर्मम और ईमानदार आत्मचिंतन की। बांग्लादेश के हिंदुओं के लिए आवाज उठाना जरूरी है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा जरूरी है भारत के हिंदुओं का जागना—अपने जनसंख्यिकीय भविष्य, अपनी सांस्कृतिक निरंतरता और अपने सामाजिक दायित्वों को लेकर।
इतिहास किसी को धमकी नहीं देता।
वह चुपचाप उदाहरण बनाकर छोड़ देता है।
हेमेन्द्र चौधरी
संस्थापक व संपादक उत्तर प्रदेश
द तहलका खबर व मानवाधिकार फास्ट न्यूज
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