‘गैस चैंबर’ राजधानी: जहां सांस लेना भी सरकार की कृपा पर है

Dec 23, 2025 - 11:12
‘गैस चैंबर’ राजधानी: जहां सांस लेना भी सरकार की कृपा पर है

देश की राजधानी दिल्ली अब किसी लोकतांत्रिक गणराज्य की राजधानी नहीं, बल्कि एक खुले आसमान के नीचे बना ‘गैस चैंबर’ बन चुकी है। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की आधिकारिक टिप्पणी है। अक्तूबर से फरवरी तक दिल्ली की हवा हर साल जहरीली हो जाती है और सत्ता तंत्र इसे “मौसमी समस्या” बताकर बेशर्मी से टाल देता है।

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देश के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत का यह कहना कि “दिल्ली में सुबह की सैर करना भी मुश्किल हो गया है, सांस घुटने लगती है” असल में एक न्यायाधीश नहीं, बल्कि दम घुटते नागरिक की चीख है। लेकिन अफसोस, सत्ता के कान इतने मोटे हो चुके हैं कि यह चीख भी उन्हें सुनाई नहीं देती।

स्थिति यह है कि जो परिवार 35–40 साल से दिल्ली में रह रहे थे, जिनका जीवन, रोजगार और पहचान इसी शहर से जुड़ी थी, वे अब शहर छोड़ने को मजबूर हैं। यह पलायन रोजगार का नहीं, जीवन बचाने का पलायन है। यह किसी विकास मॉडल की विफलता से कम नहीं।

स्वच्छ हवा कोई विलासिता नहीं, बल्कि नागरिक का मौलिक अधिकार है। इसके बावजूद दिल्ली के नागरिकों पर हर सर्दी में ऐसा अत्याचार थोपा जाता है, मानो सांस लेना कोई अपराध हो।

एक्यूआई 400–450: यह प्रदूषण नहीं, खुला जनसंहार है

शनिवार को दिल्ली के 12 इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक 400 पार कर गया। कई जगह 450 से ऊपर पहुंच गया। यह वह स्तर है, जहां स्वस्थ व्यक्ति भी बीमार पड़ सकता है, बच्चे, बुजुर्ग और दमा के मरीज तो छोड़ ही दीजिए। नोएडा में एक्यूआई 409 दर्ज किया गया।

नोएडा के नाले सूख चुके हैं और अब वे दुर्गंधमयी गैस उगलने वाले ज़हरखाने बन गए हैं। प्रशासन इसे जानता है, देखता है, सूंघता है लेकिन करता कुछ नहीं। यह लापरवाही नहीं, आपराधिक उदासीनता है।

स्कूल बंद कर दिए गए हैं। छोटे बच्चों को घरों में कैद कर दिया गया है, मानो वे किसी युद्ध क्षेत्र में रह रहे हों। मंत्री आशीष सूद 10 हजार स्कूलों में एयर प्यूरीफायर लगाने की बात कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या सरकार बच्चों को प्यूरीफायर में बंद करके रखेगी? क्या हवा को मशीनों से साफ किया जाएगा, या जिम्मेदारी से?

50 फीसदी कर्मचारियों को ‘वर्क फ्रॉम होम’ का आदेश दिया गया है। यानी सरकार खुलेआम मान रही है कि बाहर की हवा सांस लेने लायक नहीं है। फिर भी वह सत्ता में बने रहने योग्य है यह कैसी विडंबना है?

धूल, वाहन और खोखले ऐलान

दिल्ली हर पल धूल में सनी रहती है। निर्माण स्थलों से उड़ती धूल, खुली सड़कों से उठता गुबार और नियमों की धज्जियां उड़ाते ठेकेदार सब सरकार की नाक के नीचे हो रहा है। मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा चेतावनी दे रहे हैं कि अगर निर्माण कार्य नहीं रोका गया तो कार्रवाई होगी।
यह चेतावनी हर साल दी जाती है और हर साल कागजों में दम तोड़ देती है

दिल्ली-एनसीआर में 3.3 करोड़ से अधिक वाहन हैं। अकेली दिल्ली में 2.88 करोड़ वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं। आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि 51 फीसदी प्रदूषण वाहनों से होता है। इसके बावजूद सार्वजनिक परिवहन आज भी बदहाल है। निजी वाहन बढ़ते जा रहे हैं और सरकार आंख मूंदे बैठी है।

सत्ता बदली, संवेदनहीनता वही: सीएम रेखा गुप्ता कटघरे में

पहले हर सांस के लिए केजरीवाल को कोसा जाता था। अब दिल्ली पिछले 10 महीनों से भाजपा शासित है। केंद्र, उपराज्यपाल, नगर निगम सब भाजपा के हाथ में हैं। इसके बावजूद हालात बद से बदतर हैं।

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के एक्यूआई को लेकर दिए गए बयान इस संकट पर नमक छिड़कने जैसे हैं। वे प्रदूषण की भयावहता को हल्के में लेते हुए इसे “अस्थायी” या “मौसमी” समस्या बताने की कोशिश कर रही हैं। जब राजधानी का नागरिक रोज़ाना 40 सिगरेट के बराबर ज़हर फेफड़ों में भरने को मजबूर हो, तब ऐसे बयान संवेदनहीनता नहीं, निर्दयता कहलाते हैं।

कृत्रिम बारिश का प्रयोग नाकाम हो चुका है। ग्रैप के नियम पहले भी थे, आज भी हैं। फर्क बस इतना है कि सत्ता में चेहरे बदले हैं, रवैया नहीं। सवाल सीधा है भाजपा ने ऐसा क्या किया, जो पहले नहीं हुआ था?

संसद भी खामोश, सत्ता भी बेपरवाह

दिल्ली वही शहर है जहां संसद बैठती है, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सर्वोच्च न्यायालय मौजूद हैं। क्या यह जहरीली हवा उनके फेफड़ों तक नहीं पहुंचती? या फिर सत्ता के गलियारों में ऑक्सीजन अलग किस्म की होती है?

इंडिया गेट और कर्तव्य पथ धुएं में डूबे हैं। पर्यटक गायब हैं। संसद में नियम 193 के तहत प्रदूषण पर चर्चा तय थी, लेकिन वह भी हंगामे की भेंट चढ़ गई।
यह देश की सबसे बड़ी त्रासदी है कि सांस लेने का मुद्दा भी राजनीतिक शोर में दब जाता है

यह प्रकृति का नहीं, शासन का अपराध है

दिल्ली का ‘गैस चैंबर’ बनना प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह प्रशासनिक नाकामी, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और सत्ता की संवेदनहीनता का नतीजा है।
जब न्यायालय चेतावनी दे, डॉक्टर खतरे की घंटी बजाएं और नागरिक दम घुटने की शिकायत करें तब भी अगर सरकार बयानबाज़ी में लगी रहे, तो यह चूक नहीं, अपराध है।

दिल्ली को मास्क, प्यूरीफायर और छुट्टियां नहीं चाहिए। दिल्ली को चाहिए जवाबदेह शासन, कठोर फैसले और संवेदनशील नेतृत्व। 

वरना राजधानी हर साल जहरीली होती रहेगी, सरकारें बयान देती रहेंगी और नागरिक चुपचाप धुआं पीते रहेंगे।

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