राहुल गांधी के आरोप और चुनाव आयोग की जवाबदेही – जनता के भरोसे की कसौटी
लोकतंत्र का आधार जनता का विश्वास है। यह विश्वास तभी कायम रहता है, जब लोकतांत्रिक संस्थाएं अपनी पारदर्शिता और जवाबदेही पर अडिग खड़ी हों। चुनाव आयोग, जिसे देश की सबसे निष्पक्ष और स्वतंत्र संवैधानिक संस्था माना जाता है, उसकी भूमिका केवल चुनाव कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि मतदाता सूची से लेकर मतदान प्रक्रिया तक की पवित्रता को सुरक्षित रखना भी उसकी ज़िम्मेदारी है। यही कारण है कि जब इस संस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते हैं, तो यह सीधे-सीधे लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर चोट की तरह महसूस होता है।
हाल के दिनों में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने जिस तरह से मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोप उठाए हैं, उसने इस बहस को और गहरा कर दिया है। उन्होंने कर्नाटक के आलंद निर्वाचन क्षेत्र का उदाहरण देते हुए दावा किया कि वहाँ 6,018 मतदाताओं के नाम गलत तरीके से सूची से हटा दिए गए। चौंकाने वाली बात यह रही कि इन हटाए गए नामों में बूथ-स्तरीय अधिकारी के रिश्तेदार का नाम भी शामिल था, जिसके बाद जांच में कई गंभीर तथ्य सामने आए। राहुल गांधी के मुताबिक यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करने वाली साज़िश हो सकती है।
ऐसे आरोप केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं रहे। महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में भी मतदाता सूची से वैध मतदाताओं के नाम हटाए जाने की घटनाएं सामने आईं। यह स्थिति किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए बेहद चिंताजनक है। क्योंकि अगर मतदाता सूची में ही गड़बड़ी होगी, तो चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।
चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए उन्हें "गलत और आधारहीन" बताया है। यह पहली बार नहीं है जब आयोग इस तरह की प्रतिक्रिया दे रहा है। इससे पहले भी राहुल गांधी ने कर्नाटक में फर्जी मतदाताओं के नाम सूची में जोड़ने का आरोप लगाया था, जिसे आयोग ने बिना किसी विस्तृत जांच रिपोर्ट सार्वजनिक किए खारिज कर दिया था। सवाल यह है कि क्या केवल संक्षिप्त खंडन से जनता के मन में उपजे संदेह दूर हो सकते हैं?
जनता को अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस प्रमाण चाहिए। अगर मतदाता सूची के मामले में गड़बड़ी नहीं है, तो आयोग को चाहिए कि वह व्यापक और निष्पक्ष जांच कराकर तथ्यों को सार्वजनिक करे। पारदर्शिता ही एकमात्र साधन है जिससे लोकतंत्र में भरोसा कायम रह सकता है।
विडंबना यह है कि संविधान ने मतदान की प्रक्रिया को लोकतंत्र की रक्षा का सबसे सशक्त औज़ार बनाया है। लेकिन यही प्रक्रिया अगर संदेह के घेरे में आ जाए, तो लोकतंत्र की जड़ें हिल सकती हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के शोर से ऊपर उठकर चुनाव आयोग अपनी विश्वसनीयता को बचाए रखे।
बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर भी सवाल उठे हैं। आलोचकों का आरोप है कि आयोग की कार्यप्रणाली ऐसी ताकतों को बचा रही है जो लोकतंत्र को कमजोर कर सकती हैं। यह स्थिति बेहद गंभीर है। अगर जनता का भरोसा चुनाव आयोग जैसी संस्था से उठने लगे, तो लोकतंत्र का ढांचा ही खतरे में पड़ जाएगा।
दरअसल, लोकतंत्र की सबसे बड़ी गारंटी "स्वच्छ और स्वतंत्र मतदान" है। नागरिकों के मतदान का अधिकार केवल संवैधानिक प्रावधान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जीवन की आत्मा है। इस आत्मा की रक्षा करना चुनाव आयोग की सर्वोच्च जिम्मेदारी है। आयोग को समझना होगा कि उसके जवाबों का असर केवल विपक्ष या सत्ता पक्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि करोड़ों मतदाताओं की आस्था उस पर टिकी है।
इसलिए आवश्यक है कि चुनाव आयोग न केवल निष्पक्षता से कार्य करे, बल्कि अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता भी सुनिश्चित करे। क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास है। और अगर यह विश्वास डगमगाने लगे, तो यह केवल किसी राजनीतिक दल या नेता की हार नहीं होगी, बल्कि पूरे लोकतंत्र की हार होगी।
हेमेन्द्र चौधरी
संस्थापक एवं संपादक
द तहलका खबर एवं मानवाधिकार फास्ट न्यूज
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