वोटर लिस्ट में 'मूर्ख काली देवी', पिता का नाम 'राम ने शर्मा को मारा'; उधर SIR सॉफ्टवेयर की जानकारी देने से चुनाव आयोग का इनकार
यूपी की वोटर लिस्ट में अजीबोगरीब नाम और 100 से अधिक डुप्लीकेट प्रविष्टियां मिलीं। उधर चुनाव आयोग ने SIR सॉफ्टवेयर की जानकारी RTI में देने से इनकार किया।
नई दिल्ली/लखनऊ, 25 अक्टूबर 2026। उत्तर प्रदेश के झांसी–इलाहाबाद खंड स्नातक विधान परिषद निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में अजीबोगरीब नाम और कई गलतियां सामने आने के बाद निर्वाचन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। किसी महिला का नाम 'मूर्ख काली देवी', किसी मतदाता के पिता का नाम 'राम ने शर्मा को मारा' और एक अन्य मतदाता का नाम तथा उसके पिता का नाम 'टक्कर मारना' दर्ज मिलने से मामला चर्चा में आ गया। वहीं, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची में गड़बड़ियों की पहचान करने के लिए इस्तेमाल सॉफ्टवेयर का नाम और संस्करण बताने से चुनाव आयोग ने सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत इनकार कर दिया है।
इन दोनों घटनाओं ने मतदाता सूची तैयार करने, उसकी जांच करने और चुनावी प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाली तकनीक की पारदर्शिता को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
मतदाता सूची में दर्ज मिले अजीबोगरीब नाम
झांसी–इलाहाबाद खंड स्नातक विधान परिषद चुनाव की मतदाता सूची में कई ऐसी प्रविष्टियां सामने आईं, जिन्हें देखकर लोग हैरान रह गए। एक महिला का नाम 'मूर्ख काली देवी' दर्ज था, जबकि एक मतदाता के पिता का नाम 'राम ने शर्मा को मारा' लिखा मिला। इसी तरह एक अन्य पर्ची में मतदाता और उसके पिता, दोनों का नाम 'टक्कर मारना' दर्ज था।
इन मतदाता पर्चियों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मामला उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा तक पहुंचा। उन्होंने झांसी के मंडलायुक्त एवं रिटर्निंग ऑफिसर बिमल कुमार दुबे को जांच के निर्देश दिए।
जांच में मतदाता सूची की गलतियों के साथ 100 से अधिक डुप्लीकेट प्रविष्टियां भी सामने आईं। इसके बाद गलतियों को चिह्नित कर सुधार की कार्रवाई की गई और दोबारा दर्ज नामों की अलग सूची तैयार कर संबंधित मतदान केंद्रों के अधिकारियों को उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई।
नाम गलत होने पर भी पात्र मतदाता को मतदान की अनुमति
निर्वाचन विभाग ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में केवल नाम या अन्य विवरण गलत होने के कारण किसी पात्र मतदाता को मतदान से वंचित नहीं किया जाएगा।
17 अक्टूबर को जारी विज्ञप्ति में रिटर्निंग ऑफिसर ने बताया था कि मतदान केंद्र पर मतदाता की पहचान सही पाए जाने और मतदान अधिकारी के संतुष्ट होने पर उसे नियमानुसार मतदान करने दिया जाएगा।
हालांकि, इस मामले में यह सवाल बना हुआ है कि मतदाता सूची तैयार करने और अंतिम रूप देने से पहले ऐसी गलतियां क्यों नहीं पकड़ी गईं। क्या नाम दर्ज करने के दौरान गलती हुई या कंप्यूटर सॉफ्टवेयर की वजह से नाम बिगड़े, यह स्पष्ट होना जरूरी है।
SIR सॉफ्टवेयर का नाम बताने से चुनाव आयोग का इनकार
इसी बीच 25 अक्टूबर को सामने आई जानकारी के अनुसार, तेलंगाना के सामाजिक कार्यकर्ता एम. ए. मुजीब अय्यूब ने RTI के जरिए चुनाव आयोग से SIR के दौरान इस्तेमाल सॉफ्टवेयर के बारे में जानकारी मांगी थी।
उन्होंने पूछा था कि मतदाता सूची में गलतियां पहचानने के लिए किस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया, क्या इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग हुआ और क्या सॉफ्टवेयर अपने आप गलत या संदिग्ध रिकॉर्ड की पहचान करता है।
चुनाव आयोग ने सॉफ्टवेयर का नाम और संस्करण बताने से इनकार करते हुए RTI अधिनियम की धारा 8(1)(d) के तहत व्यापारिक गोपनीयता और बौद्धिक संपदा का हवाला दिया।
आयोग ने बताया कि SIR के लिए कोई नया सॉफ्टवेयर न तो विकसित किया गया और न ही खरीदा गया। हालांकि, AI या मशीन लर्निंग के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई।
आयोग ने यह भी कहा कि मतदाता सूची में किसी व्यक्ति का नाम जोड़ने या हटाने का अंतिम निर्णय संबंधित निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) तथ्यों और रिकॉर्ड के आधार पर करता है।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन, चुनाव आयोग की सुरक्षा बढ़ाई गई
चुनाव आयोग और SIR को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन भी हुए हैं। इन प्रदर्शनों और सुरक्षा संबंधी आशंकाओं के बीच चुनाव आयोग के कार्यालय के आसपास सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई गई। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की सुरक्षा भी बढ़ाकर Z+ श्रेणी कर दी गई।
सुरक्षा बढ़ाए जाने के बीच मतदाता सूची में सामने आई गलतियों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। चुनाव आयोग के कार्यालय और अधिकारियों की सुरक्षा के साथ-साथ मतदाता सूचियों की सही जांच और समय पर सुधार की व्यवस्था को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।
मतदाता सूची में गलत नाम दर्ज होने से संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी, सूची की जांच और गलतियों को रोकने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया पर सवाल खड़े हुए हैं।
चुनाव आयोग के अंदर भी कामकाज को लेकर उठे सवाल
चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज से जुड़ा एक मामला भी सामने आया है। RTI से मिली जानकारी के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 29 जुलाई को कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखे थे।
इन पत्रों में डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग से संबंधित कार्य-विभाजन के एक आदेश पर आपत्ति जताए जाने की बात सामने आई थी।
कैबिनेट सचिवालय ने इन पत्रों को पूरे चुनाव आयोग की आधिकारिक शिकायत नहीं माना और उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय तथा कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग को भेज दिया।
हालांकि, चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को स्पष्ट किया था कि जिस कार्य-विभाजन संबंधी आदेश पर सवाल उठाए गए थे, उसे लागू नहीं किया गया था और IT विभाग की निगरानी भी वास्तव में नहीं हटाई गई थी।
मतदाता सूची की गलतियों के लिए जिम्मेदार कौन?
मतदाता सूची में गलतियां सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन्हें रोकने की जिम्मेदारी किसकी है। यदि कंप्यूटर से नाम गलत दर्ज होते हैं, तो उनकी जांच कौन करता है? और यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से प्रभावित होता है, तो उसे सुधारने की व्यवस्था कितनी आसान है?
हालांकि, उत्तर प्रदेश के स्नातक निर्वाचन की मतदाता सूची में सामने आई गलतियां और SIR सॉफ्टवेयर की जानकारी से जुड़ा RTI मामला अलग-अलग हैं। अभी यह प्रमाणित नहीं हुआ है कि दोनों में एक ही सॉफ्टवेयर इस्तेमाल हुआ था या इनका तकनीकी कारण समान था।
इसके बावजूद दोनों मामलों ने मतदाता सूची की जांच, तकनीक के इस्तेमाल और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं।
चुनाव आयोग देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था है। ऐसे में मतदाता सूची में सामने आने वाली गलतियों को समय पर सुधारना और उनकी वजह स्पष्ट करना जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
आखिर लोकतंत्र में सिर्फ मतदान कराना ही जरूरी नहीं, बल्कि हर पात्र मतदाता का नाम सही तरीके से मतदाता सूची में दर्ज होना भी उतना ही जरूरी है।
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