ईरान युद्ध में घिरे ट्रंप, दावों और हकीकत में बड़ा अंतर

Mar 6, 2026 - 13:11
ईरान युद्ध में घिरे ट्रंप, दावों और हकीकत में बड़ा अंतर

पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका-ईरान युद्ध ने वैश्विक राजनीति को एक बार फिर बेहद खतरनाक मोड़ पर ला खड़ा किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया था कि ईरान अमेरिका पर बड़े हमले की तैयारी कर रहा था, इसलिए अमेरिका को पहले ही हमला कर उसे कुचलना पड़ा। ट्रंप के अनुसार इस सैन्य कार्रवाई में ईरान की नौसेना और वायुसेना लगभग पूरी तरह तबाह कर दी गई है।

हालांकि अमेरिकी रक्षा मुख्यालय Pentagon ने इस दावे को लेकर अलग ही तस्वीर पेश की है। पेंटागन ने अमेरिकी संसद की एक समिति को दी गई ब्रीफिंग में कहा कि उनके पास ऐसी कोई खुफिया जानकारी नहीं थी जिससे यह साबित हो सके कि ईरान अमेरिका पर हमला करने की योजना बना रहा था। ऐसे में राष्ट्रपति के दावे और पेंटागन की रिपोर्ट के बीच गंभीर विरोधाभास सामने आ गया है, जिससे अमेरिकी नीति और निर्णय प्रक्रिया पर भी सवाल उठने लगे हैं।

इसी बीच अमेरिका के रक्षा मंत्री Pete Hegseth ने भी एक बड़ा दावा किया है। उनका कहना है कि ईरान अमेरिकी राष्ट्रपति की हत्या की साजिश रच रहा था। इसी खतरे को देखते हुए अमेरिका ने ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei को निशाना बनाया। उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले एक सप्ताह के भीतर ईरान के आसमान पर अमेरिकी सैन्य नियंत्रण स्थापित हो सकता है।

लेकिन कई रक्षा विशेषज्ञों और वरिष्ठ कूटनीतिज्ञों का मानना है कि स्थिति इतनी सरल नहीं है। उनका कहना है कि अमेरिका इस युद्ध में काफी हद तक Benjamin Netanyahu के नेतृत्व वाले इजरायल के दबाव और उकसावे में फंस गया है। एक बार युद्ध शुरू होने के बाद अब अमेरिका के लिए इससे पीछे हटना आसान नहीं रह गया है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई की हत्या के बावजूद ईरान ने हथियार नहीं डाले हैं। बल्कि ईरान ने साफ संकेत दिया है कि वह इस हत्या का बदला लेने के लिए पूरी ताकत से लड़ाई जारी रखेगा। फिलहाल ईरान के भीतर किसी बड़े विद्रोह की खबर नहीं है, लेकिन अमेरिका और इजरायल को सबक सिखाने की आवाजें लगातार तेज हो रही हैं।

इस युद्ध में अब तक ईरान में मरने वालों की संख्या 1145 तक पहुंच चुकी है, जो लगातार बढ़ रही है। ईरान के 48 शीर्ष राजनीतिक और सैन्य नेता मारे जा चुके हैं। देश के 24 प्रांतों पर 1200 से अधिक मिसाइल हमले किए गए हैं। 153 शहरों की 504 जगहों पर बमबारी से बड़े पैमाने पर तबाही मची है। कई शहरों में इमारतें मलबे में तब्दील हो चुकी हैं और हजारों लोग बेघर हो गए हैं।

अमेरिकी और इजरायली हमलों में ईरान के लगभग 20 युद्धपोत और 14 लड़ाकू विमान भी नष्ट कर दिए गए हैं। लेकिन इसके बावजूद ईरान ने जवाबी कार्रवाई में भी जबरदस्त ताकत दिखाई है। ईरान की मिसाइलों और ड्रोन हमलों ने खाड़ी और अरब क्षेत्र में मौजूद अमेरिका के 27 सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। कई ठिकानों पर आग और धुएं के गुबार देखे गए हैं।

इजरायल भी इस संघर्ष से अछूता नहीं रहा है। राजधानी तेल अवीव और येरुशलम जैसे शहरों में कई इमारतें मिसाइल हमलों से ध्वस्त हो गई हैं। रिहायशी इलाकों पर भी हमले होने से वहां अफरा-तफरी का माहौल है।

इस युद्ध का असर खाड़ी देशों तक भी पहुंच चुका है। सऊदी अरब की दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी Saudi Aramco की विशाल रिफाइनरी पर दो बार हमला हुआ है, जिसके बाद वहां उत्पादन ठप हो गया। यह रिफाइनरी रोजाना लगभग 30 लाख बैरल तेल शोधन की क्षमता रखती है। उत्पादन रुकने से वैश्विक तेल बाजार में भी हलचल मच गई है।

ईरान ने साइप्रस और तुर्किए के क्षेत्रों में भी मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। इसके बावजूद माना जा रहा है कि ईरान की असली सैन्य ताकत अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। ईरान के भूमिगत बंकरों में हजारों बैलेस्टिक और क्रूज मिसाइलें मौजूद बताई जा रही हैं और कई उत्पादन इकाइयां अब भी सक्रिय हैं।

परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी नई चिंताएं सामने आ रही हैं। रिपोर्टों के अनुसार ईरान के पास लगभग 469 किलोग्राम 20 प्रतिशत संवर्धित यूरेनियम मौजूद है, जिससे वह सिद्धांततः 10 से 12 परमाणु बम बनाने की क्षमता हासिल कर सकता है। रूस के विदेश मंत्री ने भी संकेत दिया है कि मौजूदा युद्ध की परिस्थितियां ईरान को परमाणु हथियार बनाने की दिशा में धकेल सकती हैं।

इस युद्ध का आर्थिक असर भी दुनिया भर में दिखाई देने लगा है। अनुमान है कि इस संघर्ष से अमेरिका पर लगभग 19 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। वहीं कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 85 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी हैं और विशेषज्ञों का मानना है कि यह जल्द ही 100 डॉलर तक जा सकती हैं।

इतिहास बताता है कि जब 2008 में ईरान ने ‘शाहाब-3’ मिसाइल का परीक्षण किया था, जिसकी मारक क्षमता करीब 2000 किलोमीटर बताई गई थी, तब तेल की कीमतें 147 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। मौजूदा हालात में भी ऊर्जा बाजार में इसी तरह की उथल-पुथल की आशंका जताई जा रही है।

हालांकि भारत के लिए स्थिति फिलहाल नियंत्रण में मानी जा रही है। भारत लगभग 41 देशों से कच्चा तेल आयात करता है और होर्मुज जलडमरूमध्य के अलावा भी कई वैकल्पिक समुद्री मार्ग उपलब्ध हैं। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अत्यधिक घबराने की जरूरत नहीं है, हालांकि वैश्विक संकट का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी कुछ हद तक पड़ सकता है।

कुल मिलाकर ईरान-अमेरिका युद्ध अब केवल दो देशों का संघर्ष नहीं रह गया है। यह संघर्ष पश्चिम एशिया की स्थिरता, वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है। आने वाले दिनों में यह टकराव किस दिशा में जाएगा, इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।

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