पुलिस की नाक के नीचे फल-फूल रहा मादक पदार्थों का गोरखधंधा, उजड़ते परिवार और खामोश प्रशासन
राहुल शर्मा (क्राइम रिपोर्टर)
मथुरा में कानून की आंखों पर पट्टी, नशे के सौदागर बेखौफ
मथुरा। धार्मिक नगरी मथुरा में यदि कोई कारोबार सबसे तेजी से फैल रहा है, तो वह है मादक पदार्थों का अवैध धंधा। यह काला कारोबार न किसी सुनसान जंगल में चल रहा है, न ही किसी गुप्त अड्डे पर, बल्कि थानों की सीमाओं के भीतर, भीड़भाड़ वाले बाजारों, मुख्य सड़कों और रिहायशी इलाकों में खुलेआम फल-फूल रहा है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि सब कुछ सामने होने के बावजूद पुलिस की चुप्पी अब केवल लापरवाही नहीं, बल्कि संदिग्ध भूमिका की ओर इशारा करने लगी है।
ठिकाने चिन्हित, फिर भी कार्रवाई शून्य
शहर के कई थाना क्षेत्रों में नशे की बिक्री के ठिकाने स्पष्ट रूप से सामने आ चुके हैं :
थाना गोविंद नगर क्षेत्र – चौक बाजार, पाथीराम गली, पानी की टंकी के नीचे
थाना हाईवे क्षेत्र – बाजना गांव के मुख्य मार्ग पर, परचूनी की दुकान की आड़ में
थाना जमुनापार क्षेत्र – गांव ढेरूआ, न्यू गांधी पब्लिक स्कूल के ठीक बराबर
इन स्थानों पर नशे की बिक्री कोई छिपी हुई बात नहीं है। स्थानीय लोग सब जानते हैं, मोहल्ले के बच्चे तक पहचानते हैं कि कहां और कौन बेच रहा है, लेकिन कानून के रखवाले आंखें मूंदे बैठे हैं। यह सिर्फ नशा नहीं, बल्कि गरीबों की बर्बादी का संगठित कारोबार है।
पानी की टंकी के नीचे… नशा बेचता एक बच्चा!
सबसे ज्यादा झकझोरने वाला तथ्य थाना गोविंद नगर क्षेत्र से सामने आता है, जहां पानी की टंकी के पास मादक पदार्थों की बिक्री एक नाबालिग बच्चे से कराई जा रही है।
यह सवाल बेहद गंभीर है क्या उस बच्चे का कोई भविष्य नहीं? जिस उम्र में हाथ में किताब और कंधे पर स्कूल बैग होना चाहिए, उसी उम्र में उसे नशे का सौदागर बना दिया गया है। नशे की इस दुनिया में धकेला गया यह बच्चा कल क्या बनेगा—अपराधी, नशेड़ी या समाज पर बोझ?
इसका प्रभाव केवल आज तक सीमित नहीं है। यह उसके मानसिक, शारीरिक और नैतिक विकास को पूरी तरह नष्ट कर देगा। और सबसे बड़ा सवाल—क्या पुलिस को यह दिखाई नहीं देता, या फिर दिखाई देने के बावजूद अनदेखा किया जा रहा है?
गरीबों की मेहनत, नशे में तबाह
सूत्रों के अनुसार इन नशा विक्रेताओं के ग्राहक कोई रसूखदार लोग नहीं, बल्कि दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक, कारखानों में काम करने वाले श्रमिक हैं। जो लोग दिनभर पसीना बहाकर परिवार का पेट पालते हैं, वही शाम होते-होते नशे के जाल में फंस जाते हैं। मेहनत की कमाई नशे में उड़ जाती है। घर लौटता है तो खाली हाथ पिता, दरवाजे पर उम्मीद भरी आंखों से देखती पत्नी और भूख से बिलखते मासूम बच्चे। इन घरों में आज रोटी की कमी है, कलह है और भविष्य अंधकार में डूबता जा रहा है।
बच्चों के भविष्य से खुला खिलवाड़
सबसे भयावह स्थिति तब है जब स्कूल के ठीक पास नशे की बिक्री हो रही है। न्यू गांधी पब्लिक स्कूल के समीप मादक पदार्थों की खुलेआम बिक्री न केवल कानून व्यवस्था पर तमाचा है, बल्कि आने वाली पीढ़ी को नशे और अपराध की राह पर धकेलने की साजिश भी है।
क्या प्रशासन को इसकी भनक नहीं? या फिर सब कुछ जानकर भी अनजान बनने का नाटक किया जा रहा है?
पुलिस की चुप्पी, कई सवाल
स्थानीय लोगों का साफ कहना है कि बिना पुलिस संरक्षण के यह धंधा एक दिन भी नहीं चल सकता। जब ठिकाने तय हैं, शिकायतें मौखिक रूप से पहुंच चुकी हैं, फिर भी न छापेमारी, न गिरफ्तारी तो सवाल उठना लाजमी है क्या यह सब पुलिस की नाक के नीचे नहीं, बल्कि उसकी छांव में चल रहा है?
पुलिस से सीधी बातचीत, लेकिन जमीन पर कार्रवाई का इंतजार
उक्त प्रकरण को लेकर 26 दिसंबर 2025 को शाम 04:50 बजे थाना गोविंदनगर के थाना प्रभारी से दूरभाष के माध्यम से वार्ता की गई। उन्हें स्पष्ट रूप से अवगत कराया गया कि चौक बाजार स्थित पानी की टंकी के पास नाबालिग बच्चों द्वारा गांजा बेचा जा रहा है।
इस पर थाना प्रभारी ने कहा—
“तुम एक काम करो भाई, चौकी डीग गेट पर आ जाओ, अभी टीम बनाकर भेजता हूं।”
जब उनसे यह कहा गया कि संवाददाता कार्यालय पहुंच चुका है, तो उनका जवाब था—
“ठीक है, अभी दिखवा रहा हूं, अभी भेज रहा हूं।”
इसी क्रम में थाना हाईवे क्षेत्र में बिक रहे मादक पदार्थों को लेकर 26 दिसंबर 2025 को शाम 05:03 बजे थाना प्रभारी हाईवे से दूरभाष पर वार्ता की गई। उन्होंने कहा—
“मैं चेक कराता हूं।”
वहीं थाना जमुनापार क्षेत्र में नशे की बिक्री की सूचना दिए जाने पर थाना प्रभारी जमुनापार ने दूरभाष पर बातचीत में कहा—
“मैं दिखवाता हूं।”
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या ये आश्वासन मौखिक दायरों से बाहर निकलकर जमीनी कार्रवाई में बदलेंगे, या फिर मथुरा पुलिस के लिए यह मामला भी केवल ‘दिखवा रहे हैं’ और ‘चेक करा रहे हैं’ तक ही सीमित रह जाएगा।
धार्मिक नगरी या नशे की मंडी?
कृष्ण की नगरी मथुरा में यदि नशे के सौदागर यूं ही बेखौफ रहेंगे, तो समाज की जड़ें खोखली हो जाएंगी। नशा सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं मारता, वह पूरे परिवार, समाज और आने वाली पीढ़ी को खत्म करता है।
अब भी नहीं जागा प्रशासन तो…
यदि अब भी पुलिस और प्रशासन आंखें मूंदे रहे, तो यह मानना पड़ेगा कि नशे के सौदागरों को खुली छूट मिली हुई है।
सवाल साफ हैं
कब होगी इन ठिकानों पर कार्रवाई?
कब टूटेगा नशे का यह जाल?
और कब मिलेगा उन मासूम बच्चों को न्याय, जिनका बचपन नशे की भेंट चढ़ रहा है?
मथुरा की जनता जवाब चाहती है। अब चुप्पी नहीं, कड़ी और ईमानदार कार्रवाई ही इस जहर को रोक सकती है। मथुरा की जनता अब सिर्फ बयान नहीं, ठोस कार्रवाई देखना चाहती है।
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