जिनेवा में 1971 बांग्लादेश हिंसा का उठा मुद्दा, धार्मिक उत्पीड़न को मान्यता देने की मांग

Jul 13, 2026 - 04:54
जिनेवा में 1971 बांग्लादेश हिंसा का उठा मुद्दा, धार्मिक उत्पीड़न को मान्यता देने की मांग

हाल ही में जिनेवा में यूनाइटेड नेशंस ह्यूमन राइट्स काउंसिल के 62वें सत्र के दौरान, ह्यूमन राइट्स विदाउट फ्रंटियर्स ने 1971 में बांग्लादेश में हुई बड़ी संख्या में हत्याओं और अत्याचारों को 'नरसंहार' के रूप में मान्यता देने की आवश्यकता पर जोर दिया।

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बेल्जियम स्थित ह्यूमन राइट्स विदाउट फ्रंटियर्स के संस्थापक विली फॉट्रे ने 'मॉडर्न डिप्लोमेसी' में लिखा कि यह एक कोशिश थी, जिसमें पुराने अन्याय को आज के मानवाधिकार मुद्दों से जोड़ा गया, खासकर धर्म की आजादी और धार्मिक विश्वासों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को।

रिपोर्ट के अनुसार, 1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बड़े पैमाने पर हत्याएं और लोगों का विस्थापन हुआ, लेकिन धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों को व्यवस्थित तरीके से निशाना बनाए जाने की बात अक्सर चर्चा से बाहर रह जाती है।

विली फॉट्रे ने कहा कि खास तौर पर हिंदू समुदायों को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर चुना गया, उन्हें निशाना बनाया गया और उनके साथ अत्याचार किए गए। यह कोई अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि एक ऐसी हिंसा का हिस्सा थी जिसमें धर्म को लोगों को अलग करने और उन्हें खत्म करने के एक कारण के रूप में इस्तेमाल किया गया।

ह्यूमन राइट्स विदाउट फ्रंटियर्स का कहना है कि अगर इन अत्याचारों को नरसंहार के रूप में मान्यता नहीं दी जाती है, तो इतिहास अधूरा रह जाएगा और पीड़ित समुदायों की तकलीफों को भुला दिए जाने का खतरा रहेगा।

संगठन ने कहा कि यह जरूरी है कि उस हिंसा में धार्मिक पहलू को नजरअंदाज न किया जाए, क्योंकि इसका असर आज और भविष्य पर भी पड़ता है।

रिपोर्ट में कहा गया कि बांग्लादेश में आज भी धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों जिनमें हिंदू, बौद्ध और ईसाई शामिल हैं, उनको भेदभाव, जमीन से जुड़े विवादों और समय-समय पर होने वाली हिंसा का सामना करना पड़ता है। ऐसे में अगर अतीत की घटनाओं के लिए जवाबदेही तय नहीं होती, तो ऐसा माहौल बन सकता है जहां मानवाधिकार उल्लंघनों को सही तरीके से पहचाना या रोका नहीं जा सकेगा। इससे कमजोर समुदायों की सुरक्षा के लिए जरूरी व्यवस्था कमजोर होती है और गलत कामों को बिना सजा के जारी रहने का खतरा बढ़ता है।

लेखक ने कहा कि 1971 के नरसंहार का मुद्दा उठाकर ह्यूमन राइट्स विदाउट फ्रंटियर्स ने बांग्लादेश को जवाबदेही, अत्याचारों को रोकने और मौलिक अधिकारों की सुरक्षा पर चल रही वैश्विक चर्चा से जोड़ने की कोशिश की है।

उन्होंने कहा कि अगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय यह स्वीकार करता है कि 1971 की हिंसा में धार्मिक आधार पर व्यवस्थित उत्पीड़न भी शामिल था, तो इससे एक स्पष्ट संदेश जाता है कि पहचान के आधार पर होने वाली हिंसा को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा, चाहे वह अतीत में हुई हो या वर्तमान में हो। इससे बड़े पैमाने पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ वैश्विक नियमों को मजबूती मिलेगी और मानवाधिकारों की व्यवस्था अधिक भरोसेमंद बनेगी।

इसके अलावा, 'मॉडर्न डिप्लोमेसी' की रिपोर्ट में कहा गया कि अतीत के घावों को स्वीकार करना बांग्लादेश के लिए भी सकारात्मक भूमिका निभा सकता है। इससे शिक्षा, दस्तावेज तैयार करने, स्मारक बनाने और इतिहास को ज्यादा समावेशी तरीके से समझने के प्रयासों को मदद मिल सकती है।

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