देश में विकास की रफ्तार और रोजगार की रफ्तार एक जैसी है?
भारत में सड़क, रेलवे, डिजिटल और औद्योगिक बुनियादी ढांचे की तीव्र प्रगति हो रही है, लेकिन लोगों का मानना है कि यह विकास रोजगार सृजन के साथ तालमेल नहीं बैठा रहा है। सरकार की PLI, मेक इन इंडिया और भारतमाला जैसी पहलकदमियाँ निवेश को आकर्षित तो कर रही हैं, लेकिन स्थायी और योग्यताधारी नौकरियों की कमी अब भी एक समस्या बनी हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार, रोजगार सृजन के लिए वस्त्र, पर्यटन और लघु उद्योग जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है।
अधिकतर लोगों ने बताया कि देश में सड़क, रेल, हवाई अड्डे, डिजिटल सेवाओं और औद्योगिक परियोजनाओं का विकास हो रहा है, फिर भी रोजगार की संभावनाओं को लेकर उनकी राय मिली-जुली रही। इस स्थिति से एक महत्वपूर्ण सवाल उभरता है—क्या आर्थिक विकास की गति और रोजगार सृजन की प्रगति समान दिशा में चल रही है?
पिछले कुछ वर्षों में, केंद्र सरकार ने पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान, भारतमाला परियोजना, सागरमाला परियोजना, मेक इन इंडिया, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना और सेमीकंडक्टर मिशन जैसी कई महत्वपूर्ण पहलों की शुरुआत की हैं। इन पहलों के तहत लाखों करोड़ रुपये का निवेश सुनिश्चित किया गया है। यह सभी परियोजनाएं परिवहन, लॉजिस्टिक्स, विनिर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, बंदरगाह, रक्षा उत्पादन और डिजिटल अवसंरचना जैसे विविध क्षेत्रों को शामिल/ कवर करती हैं। सरकार का मानना है कि इन पहलों के माध्यम से सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे, जिससे भारत एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में उभर कर सामने आएगा।
हालांकि, जनता की सोच सरकार के द्वारा किए गए दावों से पूरी तरह मेल नहीं खाती। एक छात्र ने कहा,
"देश में कई बड़े प्रोजेक्ट चल रहे हैं, लेकिन सरकारी और निजी क्षेत्र में स्थायी नौकरियों की संख्या उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ रही है।"
युवा उद्यमी का कहना है कि औद्योगिक निवेश और स्टार्टअप इकोसिस्टम ने युवाओं के लिए नए अवसर प्रदान किए हैं। वहीं, स्नातक छात्रा ने साझा किया कि रोजगार उपलब्ध हैं, लेकिन कई बार ये युवाओं की योग्यता, वेतन की अपेक्षाएँ और कौशल के साथ मेल नहीं खाते।
अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की तेजी से विकसित होती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। हालाँकि, रोजगार की गुणवत्ता और उसके पर्याप्तता को लेकर बहस जारी है। विशेषज्ञों का कहना है कि आर्थिक वृद्धि के विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार समान की मात्रा समान नहीं होती। उदाहरण के लिए, उच्च तकनीकी विनिर्माण और स्वचालन पर निर्भर उद्योगों में उत्पादन तो बढ़ सकता है, लेकिन रोजगार वृद्धि इससे अधिक प्रभावित नहीं होती। दूसरी ओर, श्रम- प्रधान क्षेत्रों जैसे वस्त्र, पर्यटन, निर्माण, और लघु उद्योगों में अधिक रोजगार सृजित करने की संभावनाएँ हैं।
जनता के साथ बातचीत के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि लोग देश में बुनियादी ढांचे के विस्तार और निवेश की सराहना करते हैं। हालांकि, उनके लिए यह जरूरी है कि इससे रोजगार के अवसरों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे। केवल परियोजनाओं का उद्घाटन या निवेश की घोषणाएं उन्हें संतोष नहीं देतीं; वे ऐसे रोजगार की दिशा में बढ़ना चाहते हैं जो स्थायी, सम्मानजनक और दीर्घकालिक हों।
इसलिए यह सवाल उठता है कि देश की प्रगति के साथ-साथ इस विकास के लाभ युवाओं और रोजगार की तलाश कर रहे करोड़ों लोगों तक कितनी तेजी से पहुंच रहे हैं। आखिरकार, किसी भी अर्थव्यवस्था की असली सफलता सिर्फ उसके विकासात्मक प्रोजेक्ट्स में नहीं, बल्कि उसके नागरिकों की समृद्धि में भी निहित होती है।
What's Your Reaction?

