धर्म का चोला, अधर्म का खेल : अशोक खरात कांड ने फिर खोल दी अंधभक्ति की काली सच्चाई
आस्था के नाम पर शोषण का सिलसिला कब रुकेगा? समाज के सामने सबसे बड़ा प्रश्न
भारत जैसे आध्यात्मिक परंपराओं वाले देश में धर्म को हमेशा सत्य, सेवा, त्याग और मानव कल्याण का मार्ग माना गया है। लेकिन जब यही धर्म कुछ लोगों के हाथों धोखे, शोषण और अपराध का माध्यम बन जाता है, तो केवल कानून ही नहीं बल्कि समाज की चेतना भी कटघरे में खड़ी हो जाती है।
महाराष्ट्र के नासिक से सामने आया तथाकथित अशोक खरात प्रकरण इसी कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। आरोप है कि धार्मिक आस्था, तंत्र-मंत्र, साधना और आध्यात्मिक उपचार के नाम पर महिलाओं को अपने प्रभाव में लेकर मानसिक, आर्थिक और यौन शोषण किया गया। जांच एजेंसियों को CCTV फुटेज, कोड लैंग्वेज में सेव संपर्क, संदिग्ध दस्तावेज और डिजिटल साक्ष्य मिले हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि मामला एक सुनियोजित नेटवर्क से जुड़ा हो सकता है।
बताया गया कि आरोपी खुद को विशेष शक्तियों वाला बताकर लोगों की कमजोरियों का फायदा उठाता था और “समस्या समाधान” के नाम पर उन्हें अपने जाल में फंसाता था।
यह मामला केवल एक व्यक्ति का अपराध नहीं, बल्कि उस मानसिकता का आईना है जिसमें अंधविश्वास, डर और लालच मिलकर अपराधियों को ताकत दे देते हैं।
धर्म की आड़ में पाप करने वालों की लंबी फेहरिस्त
अशोक खरात का मामला कोई अपवाद नहीं है। इससे पहले भी कई ऐसे तथाकथित धर्मगुरु सामने आए जिन पर गंभीर आरोप लगे और अदालतों ने उन्हें दोषी ठहराया।
गुरमीत राम रहीम
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह का मामला देश के सबसे चर्चित मामलों में से एक रहा। वर्ष 2017 में सीबीआई कोर्ट ने उन्हें दो साध्वियों के साथ दुष्कर्म के मामले में 20 वर्ष की सजा सुनाई।
आसाराम बापू
आसाराम बापू एक समय देश के सबसे चर्चित धार्मिक व्यक्तियों में गिने जाते थे। वर्ष 2013 में एक नाबालिग लड़की ने उन पर जोधपुर आश्रम में दुष्कर्म का आरोप लगाया। जांच और सुनवाई के बाद वर्ष 2018 में अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। उनके खिलाफ अन्य महिलाओं द्वारा भी शोषण के आरोप लगाए गए। इस मामले ने यह साबित किया कि धार्मिक प्रभाव कितना बड़ा क्यों न हो, कानून से ऊपर कोई नहीं।
नारायण साईं
आसाराम के पुत्र नारायण साईं पर भी महिलाओं के शोषण के गंभीर आरोप लगे। आश्रम में रहने वाली महिलाओं ने आरोप लगाया कि आध्यात्मिक मार्गदर्शन के नाम पर उनका दुरुपयोग किया गया। बाद में अदालत ने उन्हें भी दुष्कर्म के मामले में दोषी माना। यह मामला इस बात का उदाहरण बना कि गलत परंपराएं परिवार या संस्था के भीतर भी आगे बढ़ सकती हैं।
रामपाल
संत रामपाल का सतलोक आश्रम विवाद वर्ष 2014 में देशभर में चर्चा का विषय बना। पुलिस कार्रवाई के दौरान आश्रम परिसर में हिंसा हुई, जिसमें कई लोगों की मौत हुई। उन पर अवैध गतिविधियां, हिंसा, कानून व्यवस्था में बाधा और अन्य गंभीर आरोप लगे। बाद में उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई। इस मामले ने यह दिखाया कि धार्मिक संस्थानों में पारदर्शिता का अभाव कितना खतरनाक हो सकता है।
स्वामी नित्यानंद
स्वामी नित्यानंद पर महिलाओं के यौन शोषण और गलत गतिविधियों के आरोप लगे। वर्ष 2019 में विवाद बढ़ने के बाद वे भारत छोड़कर विदेश चले गए। बाद में उन्होंने एक तथाकथित “स्वतंत्र देश” बनाने का दावा किया, जिसने इस मामले को और अधिक विवादित बना दिया। उनके कई वीडियो और आरोपों ने धार्मिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए।
स्वामी भीमानंद
स्वामी भीमानंद, जिन्हें “इच्छाधारी बाबा” कहा जाता था, पर देह व्यापार रैकेट चलाने के आरोप लगे। दिल्ली में चल रहे एक हाई-प्रोफाइल सेक्स रैकेट मामले में उनका नाम सामने आया। जांच में सामने आया कि धार्मिक पहचान का उपयोग कर प्रभाव और संपर्क बनाए गए थे।
स्वामी प्रेमानंद
तमिलनाडु के स्वामी प्रेमानंद पर कई महिलाओं से दुष्कर्म और शोषण के आरोप लगे। जांच में उनके आश्रम से कई आपत्तिजनक सबूत मिले। अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया और सजा सुनाई। यह मामला दक्षिण भारत के सबसे चर्चित धार्मिक अपराध मामलों में से एक माना गया।
निर्मल बाबा
निर्मल बाबा टीवी कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को समस्याओं के समाधान के नाम पर सलाह देते थे। उन पर आरोप लगे कि वे अजीबोगरीब उपाय बताकर लोगों से बड़ी राशि लेते थे। उनके खिलाफ आर्थिक अनियमितताओं और भ्रामक दावों की जांच भी हुई। इस मामले ने यह दिखाया कि धार्मिक या आध्यात्मिक सलाह के नाम पर आर्थिक शोषण भी एक बड़ा मुद्दा है।
एक समय जिनके चरणों में लाखों लोग सिर झुकाते थे, आज वही नाम अदालतों और जेलों से जुड़े हुए हैं।
यह स्थिति समाज के लिए शर्मनाक ही नहीं, बल्कि चेतावनी भी है।
आखिर लोग बार-बार क्यों फंस जाते हैं?
इतने मामलों के बाद भी समाज का एक वर्ग ऐसे लोगों के प्रभाव में क्यों आ जाता है?
अंधविश्वास की जड़ें बहुत गहरी हैं
धर्म लोगों की भावनाओं से जुड़ा विषय है। जब कोई व्यक्ति धार्मिक भाषा, चमत्कार या विशेष शक्तियों का दावा करता है, तो लोग उसकी बातों पर जल्दी विश्वास कर लेते हैं।
समस्याओं से घिरे लोग जल्दी समाधान चाहते हैं
बीमारी, नौकरी की परेशानी, पारिवारिक विवाद, विवाह संबंधी समस्या या आर्थिक संकट — इन परिस्थितियों में व्यक्ति मानसिक रूप से कमजोर हो जाता है और किसी भी सहारे की तलाश करता है।
भीड़ का मनोविज्ञान
जब हजारों लोग किसी बाबा को मानते हैं, तो नया व्यक्ति भी सोचता है कि इतने लोग गलत नहीं हो सकते।
डर और भ्रम का माहौल
कुछ मामलों में लोगों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि गुरु का विरोध करने से दुर्भाग्य आ सकता है या जीवन में समस्या बढ़ सकती है।
महिलाओं के संदर्भ में बड़ा सामाजिक प्रश्न
अशोक खरात जैसे मामलों में यह सवाल भी उठता है कि आखिर महिलाएं ऐसे लोगों के संपर्क में क्यों जाती हैं।
यह विषय अत्यंत संवेदनशील है और इसका उत्तर एकतरफा नहीं हो सकता।
संभावित कारण
- व्यक्तिगत समस्या का समाधान खोजने की कोशिश
- मानसिक या भावनात्मक सहारे की तलाश
- धार्मिक विश्वास
- सामाजिक दबाव
- डर या ब्लैकमेल
- मनोवैज्ञानिक प्रभाव
कुछ मामलों में आरोपी व्यक्ति पहले विश्वास जीतते हैं, फिर धीरे-धीरे व्यक्ति को मानसिक रूप से प्रभावित करते हैं और उसे अपने नियंत्रण में ले लेते हैं।
यह भी चर्चा का विषय है कि क्या कुछ मामलों में लालच, निजी लाभ या व्यक्तिगत अपेक्षाएं भी भूमिका निभाती हैं — यह हर मामले में जांच का विषय होता है।
लेकिन यह स्पष्ट है कि किसी भी परिस्थिति में शोषण को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
“धर्म विधा” का तर्क – क्या यह स्वीकार्य है?
कई मामलों में आरोपी यह दावा करते हैं कि उनके द्वारा किया गया कार्य किसी धार्मिक प्रक्रिया या साधना का हिस्सा था।
लेकिन कोई भी धर्म अनैतिक कार्य, जबरदस्ती या शोषण की अनुमति नहीं देता।
धर्म का मूल उद्देश्य है, आत्मसंयम, मर्यादा,
यदि किसी कथित धार्मिक प्रक्रिया में व्यक्ति की गरिमा का उल्लंघन होता है, तो वह धर्म नहीं बल्कि अपराध की श्रेणी में आता है।
डिजिटल दौर में ब्लैकमेल का नया हथियार
जांच में सामने आया है कि कई मामलों में वीडियो रिकॉर्डिंग का उपयोग कर पीड़ितों को डराया जाता है, जिससे वे शिकायत करने से डरते हैं। इससे परिवारों पर सामाजिक और मानसिक दबाव बढ़ जाता है।
यह स्थिति समाज के लिए बेहद चिंताजनक है क्योंकि तकनीक का गलत उपयोग अपराध को और जटिल बना देता है।
क्या ये स्वयं को भगवान समझ बैठे हैं?
इनके आश्रमों और प्रचार सामग्री में अक्सर ऐसे पोस्टर, फोटो और होर्डिंग देखने को मिलते हैं जिनमें ये तथाकथित संत एक हाथ उठाकर आशीर्वाद देने की मुद्रा में दिखाई देते हैं, मानो वे स्वयं ही लोगों के भाग्य विधाता हों। प्रश्न यह उठता है कि क्या ये लोग स्वयं को भगवान मान बैठे हैं? क्या ये यह संदेश देना चाहते हैं कि इनके पास ऐसी अलौकिक शक्तियां हैं जो परमात्मा से भी ऊपर हैं?
धर्म का मूल स्वरूप विनम्रता, सेवा और त्याग पर आधारित होता है। सच्चे संत कभी स्वयं को भगवान नहीं बताते, बल्कि वे हमेशा ईश्वर का दास होने की बात करते हैं। लेकिन जब कोई व्यक्ति अपने चित्रों, मंचों और प्रवचनों में स्वयं को चमत्कारी, सर्वशक्तिमान और जीवन बदलने वाला बताने लगे, तो यह स्थिति आस्था नहीं बल्कि अंधभक्ति को बढ़ावा देने वाली मानसिकता को दर्शाती है।
विडंबना यह है कि जो व्यक्ति स्वयं को आध्यात्मिक मार्गदर्शक बताता है, वही यदि गंभीर अनैतिक और आपराधिक कृत्यों में संलिप्त पाया जाए, तो यह केवल व्यक्तिगत पतन नहीं बल्कि धर्म की गरिमा पर भी आघात होता है।
यह समझना आवश्यक है कि ईश्वर का स्थान सर्वोच्च है, किसी व्यक्ति विशेष को उस स्थान पर बैठाना ही अंधभक्ति की शुरुआत है।
जब कोई तथाकथित गुरु अपने आश्रम में अपने ही बड़े-बड़े चित्र लगाकर, अपने चरणों में सिर झुकाने को प्रेरित करता है, तो समाज को सावधान हो जाना चाहिए।
क्योंकि इतिहास गवाह है, जहां व्यक्ति भगवान बन बैठता है, वहां अक्सर सत्य, नैतिकता और मानवता सबसे पहले घायल होती है।
सबसे बड़ी जिम्मेदारी समाज की भी
ऐसे मामलों में केवल आरोपी को दोष देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज को भी आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। सच्चाई यह है कि इन जैसे पाखंडी और ढोंगी लोगों की ताकत उनकी कथित “अलौकिक शक्ति” नहीं, बल्कि अंधभक्ति करने वाली भीड़ होती है।
सबसे बड़ी गलती उन लोगों की है जो बिना सोचे-समझे किसी व्यक्ति को भगवान का दर्जा दे देते हैं। जब कोई व्यक्ति अपने घर की समस्याओं, बीमारी, नौकरी, विवाह या आर्थिक परेशानी का समाधान किसी तथाकथित बाबा के चरणों में ढूंढने लगता है, तभी ऐसे लोगों की दुकान चलने लगती है।
यह कटु सत्य है कि यदि समाज ऐसे पाखंडियों के पास जाना बंद कर दे, तो न तो इनके आश्रमों की भीड़ रहेगी, न ही इनके प्रभाव का डर रहेगा और न ही कोई व्यक्ति शोषण का शिकार होगा।
अंधभक्ति ही वह ईंधन है जिससे ऐसे ढोंगी अपनी ताकत बढ़ाते हैं।
जब लोग आंख बंद करके विश्वास करते हैं, सवाल पूछना छोड़ देते हैं और हर बात को चमत्कार मान लेते हैं, तब अपराध करने वालों का हौसला और बढ़ जाता है।
धर्म का अर्थ कभी भी किसी व्यक्ति विशेष के आगे समर्पण करना नहीं रहा। धर्म का अर्थ है सत्य को समझना, विवेक से निर्णय लेना और सही-गलत में अंतर करना।
समाज को यह समझना होगा कि भगवान आस्था का विषय हैं, कोई व्यक्ति भगवान नहीं हो सकता।
अशोक खरात जैसे मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि धर्म का चोला पहनकर अधर्म करने वाले लोग समाज की कमजोरी का फायदा उठाते हैं।
जिस दिन जनता यह तय कर लेगी कि वह किसी भी व्यक्ति को अंधविश्वास के आधार पर भगवान नहीं मानेगी, उसी दिन ऐसे पाखंडियों का अस्तित्व स्वतः समाप्त हो जाएगा।
इसलिए आवश्यकता है जागरूक बनने की, प्रश्न पूछने की और अपनी आस्था को अंधविश्वास बनने से रोकने की।
क्योंकि जब जनता जागरूक होती है, तभी समाज सुरक्षित होता है।
हेमेन्द्र चौधरी
संस्थापक व संपादक
द तहलका खबर व मानवाधिकार फास्ट न्यूज
What's Your Reaction?

