मथुरा न्यूरो हॉस्पिटल की पोल खुलते ही बौखलाया तंत्र, संपादक को फोन पर डराने की कोशिश

Dec 22, 2025 - 19:05
Dec 22, 2025 - 19:10

मथुरा। बिना पंजीकरण वर्षों से संचालित मथुरा न्यूरो हॉस्पिटल की सच्चाई जब मानवाधिकार फास्ट न्यूज के माध्यम से सामने आई, तो नियमों पर चलने की बजाय सवालों से बचने और सच को दबाने का रास्ता चुना गया। अस्पताल की अवैध हकीकत उजागर होते ही कथित तौर पर उससे जुड़े एक व्यक्ति ने समाचार पत्र के संपादक को फोन पर धमकाने और दबाव बनाने की कोशिश की। यह प्रकरण अब केवल एक अस्पताल की अनियमितताओं का नहीं, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता पर सीधे हमले का रूप ले चुका है।

अब खबरें आपके मोबाइल पर!
Tehelka Khabar App डाउनलोड करें और ताज़ा खबरों से जुड़े रहें।

21 दिसंबर 2025 को दोपहर 01:57 बजे संपादक के मोबाइल पर,  8171371110 नंबर से व्हाट्सएप्प कॉल आई। ट्रूकॉलर पर यह नंबर “पिंकु ठाकुर” के नाम से दर्शाया गया। कॉल करने वाले ने स्वयं को मथुरा न्यूरो हॉस्पिटल से जुड़ा बताया और पहले सामान्य पूछताछ की, लेकिन कुछ ही मिनटों में बातचीत आरोपों, सवालों और धमकी भरे लहजे में तब्दील हो गई।
“आप अस्पताल क्यों नहीं आए?”, “वेरीफिकेशन क्यों नहीं किया?”, “46 अस्पताल हैं, सबसे पहले यही क्यों?” ये सवाल पूछताछ नहीं, बल्कि खबर की साख पर हमला और दबाव बनाने की रणनीति प्रतीत हुए।

बातचीत के दौरान बार-बार संपादक को अस्पताल बुलाने पर जोर दिया गया—“खबर छापी है तो अस्पताल आकर बैठकर बात करिए।” संपादक ने दो टूक कहा कि खबर मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) और पंजीकरण पटल से आधिकारिक पुष्टि के बाद ही प्रकाशित की गई है। इसके बावजूद फोन पर यह दबाव बनाया जाता रहा कि “फोन पर नहीं, आमने-सामने फैसला होगा।”

यहीं नहीं रुके। बातचीत के दौरान संपादक के निवास स्थान का उल्लेख करना और यह कहना कि “मैं नोएडा आकर आपसे मिलता हूं, आज शाम तक फोन उठाते रहना” खुली धमकी और डराने की कोशिश के दायरे में आता है। यह न सिर्फ एक पत्रकार की सुरक्षा और स्वतंत्रता पर हमला है, बल्कि कानून-व्यवस्था की स्थिति पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

अब प्रशासनिक मोर्चे पर भी हलचल
22 दिसंबर 2025 को इस पूरे प्रकरण पर अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अनुज चौधरी से ऑन-कैमरा आधिकारिक पक्ष लिया गया। उन्होंने साफ कहा कि मथुरा न्यूरो हॉस्पिटल पिछले वर्ष पंजीकृत था, लेकिन वर्तमान वर्ष में उसका पंजीकरण नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अस्पताल रिहायशी भूखंड पर संचालित है और लैंड यूज परिवर्तन की प्रक्रिया आवास विकास विभाग में शुरू की गई थी। इसी कारण कुछ समय दिया गया, लेकिन अब नियमानुसार कार्रवाई तय है।

जानकारी के लिए आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश भवन उपविधि और मॉडल ज़ोनिंग रेगुलेशन्स के तहत अस्पताल, नर्सिंग होम और डायग्नोस्टिक सेंटर “Health Care Building” की श्रेणी में आते हैं। आवासीय भूखंड को अस्पताल के लिए तभी बदला जा सकता है, जब सड़क की न्यूनतम चौड़ाई, सेट-बैक, अनुमन्य FAR, पर्याप्त पार्किंग, फायर एनओसी और क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट का वैध पंजीकरण जैसी शर्तें पूरी हों। इन शर्तों के बिना अस्पताल संचालन अवैध माना जाएगा।

सवाल अब और तीखे हैं :-

  • क्या बिना पंजीकरण अस्पताल चलाना कोई मामूली चूक है?
  • क्या नियमों की बात उठाने वालों को फोन कॉल और धमकी से चुप कराया जाएगा?
  • क्या प्रशासन सिर्फ अवैध अस्पताल पर ही नहीं, बल्कि पत्रकार को डराने की इस कोशिश पर भी सख्त रुख अपनाएगा?

यह मामला अब एक अस्पताल की अनियमितता भर नहीं रहा। यह उस व्यवस्था की कसौटी बन चुका है, जहां तय होना है कि सच लिखने की सजा धमकी होगी या कानून का संरक्षण।

 

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow