अहंकार की भाषा, लोकतंत्र पर वार: ‘फोकट’ से ‘घंटा’ तक का सफर

Jan 3, 2026 - 10:10
Jan 3, 2026 - 10:12
अहंकार की भाषा, लोकतंत्र पर वार: ‘फोकट’ से ‘घंटा’ तक का सफर

इंदौर में दूषित पानी पीने से लोगों की मौत हो रही है। यह कोई छोटी प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक भयावह व्यवस्था-विफलता है। घरों के चिराग बुझ चुके हैं, कमाऊ बेटे चले गए हैं, बुज़ुर्गों के साये छिन गए हैं और अस्पतालों में जिंदगी मौत से जूझ रही है। ऐसे समय में सवाल उठना स्वाभाविक ही नहीं, अनिवार्य है। लेकिन जब इन्हीं सवालों के जवाब में मध्य प्रदेश के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय कहते हैं—“फोकट के सवाल मत पूछो” और “क्या घंटा होकर आए हो”—तो यह बयान केवल असंवेदनशील नहीं रहता, यह लोकतंत्र के मूल विचार पर सीधा हमला बन जाता है।

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यह शब्द किसी सड़कछाप व्यक्ति के नहीं हैं, बल्कि एक ऐसे नेता के हैं जो वर्षों से सत्ता के केंद्र में रहे हैं, जिनके पास अनुभव है, ताकत है और जिम्मेदारी भी। लेकिन यही अनुभव जब संवेदना की जगह अहंकार में बदल जाए, तो वह भाषा को जहरीला बना देता है। सवाल यह नहीं है कि बयान किसने दिया, सवाल यह है कि बयान किस मानसिकता को उजागर करता है।

लोकतंत्र में सवाल ‘फोकट’ नहीं होते। सवाल जवाबदेही की बुनियाद होते हैं। सवाल उस भरोसे की आवाज़ होते हैं, जो जनता ने अपने प्रतिनिधियों पर किया है। सवाल उस पीड़ा का स्वर होते हैं, जो मरने वालों के परिजनों की आंखों में तैर रही है। ऐसे सवालों को ‘फोकट’ कहना दरअसल जनता की पीड़ा को ‘फालतू’ ठहराने जैसा है।

और फिर आता है ‘घंटा’ शब्द। ‘घंटा’ भारतीय समाज में एक पवित्र और अनुशासन का प्रतीक है। मंदिर में बजे तो पूजा आरंभ होती है, स्कूल में बजे तो पढ़ाई शुरू होती है, दफ्तर में बजे तो समय का अनुशासन तय होता है। लेकिन जब सत्ता में बैठे मंत्री इस शब्द को व्यंग्य और अपमान के रूप में इस्तेमाल करते हैं, तो उसका अर्थ बदल जाता है। तब वह शब्द नहीं रह जाता, वह उस वोटर के गाल पर तमाचा बन जाता है, जिसने कतार में खड़े होकर वोट दिया था, उम्मीद की थी कि उसका प्रतिनिधि संकट में उसके साथ खड़ा होगा।

यह पहला मौका नहीं है जब कैलाश विजयवर्गीय की भाषा सवालों के घेरे में आई हो। उनका राजनीतिक इतिहास ऐसे बयानों से भरा पड़ा है, जिन्होंने बार-बार विवाद खड़े किए हैं। कभी महिलाओं के पहनावे को लेकर टिप्पणी, कभी सामाजिक आचरण पर उपदेशात्मक बयान, कभी आलोचकों को अपमानित करने वाली भाषा—हर बार यह साबित हुआ कि सत्ता में बैठे इस नेता की जुबान संयम से ज्यादा आक्रामकता चुनती है। हर विवाद के बाद सफाई आती है, लेकिन व्यवहार में बदलाव शायद ही कभी दिखता है।

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सत्ता मिलते ही भाषा क्यों बदल जाती है? चुनाव के समय वही नेता गली-गली घूमते हैं, बुज़ुर्गों के पैर छूते हैं, माताओं-बहनों से आशीर्वाद लेते हैं, युवाओं से सपने बांटते हैं। उस वक्त हर सवाल महत्वपूर्ण लगता है, हर शिकायत गंभीर लगती है। लेकिन जैसे ही सत्ता हाथ में आती है, वही जनता बोझ बन जाती है, वही सवाल ‘फोकट’ हो जाते हैं और वही पीड़ा ‘घंटा’ कहलाने लगती है।

इंदौर को स्वच्छता के पुरस्कारों से सजाया गया है। पोस्टरों, होर्डिंग्स और प्रचार में शहर को मॉडल सिटी बताया जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि साफ दिखने वाले इस शहर के भीतर गंदगी ने जान ले ली। नर्मदा के नाम पर लोगों को ज़हर पिलाया गया। यह सिस्टम की नालायकी है, यह नगर निगम की विफलता है, यह प्रशासनिक लापरवाही है। और इस सब पर सवाल उठाना अगर ‘फोकट’ है, तो फिर लोकतंत्र का मतलब ही क्या रह जाता है?

सत्ता का असली इम्तिहान संकट के समय होता है। तब नेता की असली शक्ल सामने आती है। क्या वह पीड़ितों के साथ खड़ा होता है, या सवाल पूछने वालों से चिढ़ता है? क्या वह जिम्मेदारी स्वीकार करता है, या भाषा के सहारे बचने की कोशिश करता है? कैलाश विजयवर्गीय का यह बयान बताता है कि सवालों से सामना करने की जगह तिरस्कार चुना गया।

लोकतंत्र में जनता मालिक होती है और नेता सेवक। लेकिन जब सेवक मालिक बनने लगे, तो भाषा भी बदल जाती है। फिर ‘जनता’ शब्द सम्मान नहीं, झंझट लगने लगता है। यही वजह है कि ऐसे बयान केवल व्यक्तिगत नहीं होते, वे पूरे राजनीतिक चरित्र को उजागर करते हैं।

आज जरूरत इस बात की है कि जनता इन शब्दों को भूले नहीं। क्योंकि लोकतंत्र में स्मृति सबसे बड़ा हथियार होती है। जो नेता सवालों को ‘फोकट’ और जनता को ‘घंटा’ समझने लगे, उसे याद दिलाना जरूरी है कि असली घंटा जनता ही बजाती है—चुनाव के दिन। और जब वह घंटा बजता है, तो सिर्फ पूजा या पढ़ाई शुरू नहीं होती, सत्ता का हिसाब भी शुरू हो जाता है।

यह लेख किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, उस मानसिकता के खिलाफ है जो सत्ता को सेवा नहीं, विशेषाधिकार समझती है। सवाल पूछना अपराध नहीं है। सवालों से भागना अपराध है। और सवालों का अपमान करना लोकतंत्र के खिलाफ सबसे बड़ा अपराध।

हेमेन्द्र चौधरी

संस्थापक एवं संपादक 

द तहलका खबर एवं मानवाधिकार फास्ट न्यूज 

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