क्या लोकतंत्र में जनता सिर्फ वोटर बनकर रह गई है?
छात्रों, किसानों, महिलाओं और युवाओं के बीच बातचीत से यह बात सामने आई है कि नागरिक केवल वोट देने तक सीमित नहीं रहना चाहते; वे नीति निर्माण में भी सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं। इस दिशा में MyGov, CPGRAMS और जनसुनवाई जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किए गए हैं। हालांकि, लोगों का अनुभव है कि उनके विचार चुनाव के बाद अक्सर अनसुने रह जाते हैं और केवल तभी सुने जाते हैं जब वे सोशल मीडिया या बड़े आंदोलनों के जरिए अपनी बात रखते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए नागरिकों और सत्ता के बीच चुनाव बाद भी निरंतर संवाद बनाए रखना आवश्यक है।
इसी सवाल के साथ हमने छात्रों, किसानों, महिलाओं, छोटे व्यापारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पहली बार वोट देने वाले युवाओं से बातचीत की। अधिकांश लोगों ने माना कि मतदान लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण अधिकार है, लेकिन कई नागरिकों को लगता है कि उनकी भूमिका अक्सर मतदान केंद्र तक सीमित होकर रह जाती है। उनका सवाल था—क्या जनता केवल वोट देने के लिए याद की जाती है, या नीतियां बनाने और फैसले लेने की प्रक्रिया में भी उसकी भागीदारी होती है?
"चुनाव के दौरान जनता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, लेकिन क्या चुनाव खत्म होने के बाद उनकी आवाज़ की भी उतनी ही महत्वपूर्ण रहती है?"
इसी विषय पर हमने छात्रों, किसानों, महिलाओं, छोटे व्यापारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पहली बार वोट डालने वाले युवाओं से चर्चा की। अधिकतर लोगों का मत था कि मतदान लोकतंत्र का सबसे अहम अधिकार है, लेकिन कई नागरिकों का मानना था कि उनकी सक्रियता केवल मतदान केंद्र तक ही सीमित रह जाती है। उनका यह सवाल था—क्या जनता केवल वोट देने के लिए याद की जाती है, या वह नीतियों के निर्माण और निर्णय प्रक्रिया में भी सक्रिय भागीदारी रखती है?
पिछले कुछ वर्षों में, सरकारों ने नागरिकों की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण उपाय किए हैं। MyGov पोर्टल, CPGRAMS (केंद्रीय लोक शिकायत निवारण प्रणाली), डिजिटल इंडिया मिशन, स्वच्छ भारत अभियान, और विभिन्न राज्यों की जनसुनवाई प्रणालियाँ, ये सभी नागरिकों को शासन के साथ सीधे संलग्न करने का उद्देश्य रखते हैं। इन पहलों में हजारों करोड़ रुपये का निवेश हुआ है, जिससे करोड़ों लोग डिजिटल सेवाओं, शिकायत निवारण, और नीति संबंधी सुझावों के दृष्टिकोण से जुड़े हुए हैं। सरकार का मानना है कि तकनीक ने नागरिकों और प्रशासन के बीच की दूरी को काफी कम किया है।
हालांकि, जनता की भावना इसके बिलकुल विपरीत है। एक किसान ने टिप्पणी करते हुए कहा,
“हम मतदान तो करते हैं, लेकिन हमारी स्थानीय समस्याएं कई बार वर्षों तक नजरअंदाज की जाती हैं।”
दूसरी ओर, दिल्ली विश्वविद्यालय की एक छात्रा ने उल्लेख किया कि,
“चुनावों के दौरान रोजगार, शिक्षा और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर व्यापक चर्चा होती है, लेकिन इन विषयों पर नियमित संवाद के कमी के कारण बाद में इन्हें नजरअंदाज किया जाता है।“
इसी तरह, एक छोटे व्यवसायी ने कहा कि-
“नागरिकों की आवाज़ तब ही अधिक प्रभावी होती है जब वे सोशल मीडिया, मीडियाई रिपोर्ट या किसी जन आंदोलन का हिस्सा बनते हैं। “
हाल के समय में, किसानों के आंदोलनों, प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थियों के प्रदर्शन, स्थानीय पर्यावरण अभियानों और नागरिक समूहों द्वारा चलाए गए विभिन्न अभियानों ने यह स्पष्ट किया है कि लोग केवल मतदान तक ही सीमित नहीं रहना चाहते। जंतर-मंतर और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर आयोजित कई शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में युवाओं ने रोजगार, परीक्षा पारदर्शिता और जवाबदेही से संबंधित मुद्दे उठाए। यह इस बात का संकेत है कि नागरिक लोकतंत्र में अपनी भूमिका को सिर्फ मतदाता के रूप में नहीं देखते, बल्कि वे नीति निर्माण और सार्वजनिक विमर्श में सक्रिय भागीदारी की भी अपेक्षा रखते हैं।
लोकतंत्र और सार्वजनिक नीति के विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र की शक्ति का आकलन केवल चुनावों के आधार पर नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि,
“नागरिकों की भागीदारी चुनावी प्रक्रिया के समाप्त होने के बाद भी महत्वपूर्ण होनी चाहिए।“
यह भागीदारी विभिन्न रूपों में हो सकती है, जैसे जनसुनवाई, स्थानीय निकायों की बैठकें, सामाजिक अभियानों में शामिल होना, या डिजिटल प्लेटफार्मों के जरिए सुझाव देना। विशेषज्ञ यह भी समझते हैं कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में करोड़ों नागरिकों की आशाओं को शासन के तंत्र में शामिल करना सरल नहीं है, लेकिन नागरिकों और संस्थानों के बीच संवाद को मजबूत करना लोकतांत्रिक स्थिरता के लिए अनिवार्य है।
हालांकि, चुनौतियों की कमी नहीं है। बहुत से नागरिकों की यह शिकायत है कि,
“सरकारी प्रक्रियाएं काफी जटिल हैं, जनप्रतिनिधियों तक पहुंच बनाना कठिन है, और कई मामलों में शिकायतों का समाधान करने में समय लग जाता है। “
दूसरी ओर, प्रशासनिक अधिकारी यह बताते हैं कि, “सीमित संसाधनों और बड़ी आबादी के चलते हर समस्या का तात्कालिक समाधान करना हमेशा संभव नहीं होता। यही वजह है कि अक्सर जनता की अपेक्षाओं और सरकारी तरीके के बीच एक दूरी बन जाती है। “
जनता से हुई बातचीत के परिणाम से यह स्पष्ट हुआ कि अधिकांश नागरिक केवल एक वोटर के रूप में सीमित नहीं रहना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि उनकी आवाज़ चुनाव के मौसम के बाहर भी सुनी जाए और वे निर्णय प्रक्रिया में, चाहे वह स्थानीय हो या राष्ट्रीय, महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें। लोकतंत्र सिर्फ मतदान का अधिकार होने का नाम नहीं है; यह नागरिकों और सत्ता के बीच एक निरंतर संवाद का प्रयास है। असली प्रश्न यह नहीं है कि जनता मतदान करने में सीमित रह गई है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हमारा लोकतंत्र नागरिकों को वोटिंग के अलावा भी प्रभावी रूप से भाग लेने का पर्याप्त अवसर प्रदान कर रहा है।
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