क्या सरकारी योजनाओं की सफलता लाभार्थी तय करें या सरकार?
सरकारी आँकड़े और लोगों के अनुभव अक्सर अलग-अलग तस्वीर पेश करते हैं - जल जीवन मिशन, आयुष्मान भारत और PM-KISAN जैसी योजनाओं के मामले में कई जगह नल लगा है, लेकिन पानी नहीं आता, कई जगह गैस कनेक्शन मिला है, लेकिन सिलेंडर भरवाना मुश्किल है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी योजना की सफलता को सिर्फ लाभार्थियों की संख्या या खर्च किए गए बजट से नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में आए वास्तविक बदलाव से मापा जाना चाहिए। निष्कर्ष यही है कि योजना की असली कसौटी सरकारी आँकड़ों में नहीं, बल्कि लाभार्थी के अनुभव में छिपी होती है।
"गाँव में हर घर तक पानी का नल पहुँच गया है,"
यह एक सरकारी विज्ञापन में बताया गया है। हालांकि, वहीं की एक महिला का कहना है,
"नल तो है, लेकिन कई दिनों तक पानी नहीं आता।"
इसी गांव का एक परिवार यह भी बताता है कि पहले उन्हें रोज़ाना पानी लाने के लिए कई किलोमीटर चलना पड़ता था, लेकिन अब उन्हें यह घर पर ही उपलब्ध है। इन दोनों अनुभवों का संबंध एक ही सरकारी योजना से है, फिर भी लोग अलग-अलग तरह से इसे महसूस कर रहे हैं।
यहाँ पर एक बड़ा सवाल उठता है—क्या सरकारी योजनाओं की सफलता का निर्धारण सरकार को करना चाहिए, या उन लोगों को, जो वास्तव में इन योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं?
इस सवाल को समझने के लिए, हमने लोगों और ग्रामीण परिवारों से बातचीत की। हमने उनसे पूछा कि क्या उन्हें लगता है कि सरकारी योजनाओं की सफलता का मूल्यांकन केवल सरकारी आंकड़ों पर किया जाना चाहिए। अधिकांश लोगों ने यह माना कि आंकड़े महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय उन लोगों के अनुभवों पर आधारित होना चाहिए, जिनके जीवन पर योजनाओं का प्रभाव पड़ता है।
पिछले दस वर्षों में, केंद्र और राज्य सरकारों ने कई महत्वपूर्ण कल्याणकारी और बुनियादी ढांचे के कार्यक्रमों को लागू किया है। योजना के तहत लाखों घरों का निर्माण होने का दावा किया गया है। आयुष्मान भारत योजना के माध्यम से करोड़ों लोगों को स्वास्थ्य बीमा का लाभ मिला है। जल जीवन मिशन के तहत ग्रामीण क्षेत्रों के घरों तक नल के पानी की पहुँच सुनिश्चित करने का उद्देश्य रखा गया है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) के तहत किसानों को सीधी आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। इसके अतिरिक्त, स्वच्छ भारत मिशन, उज्ज्वला योजना, गति शक्ति, भारतमाला और विभिन्न मेट्रो परियोजनाओं पर अरबों रुपये खर्च किए गए हैं।
सरकारी रिपोर्टों से पता चलता है कि इन योजनाओं ने लाखों परिवारों के जीवन में सकारात्मक सुधार किया है। हालांकि, जब हमने एक किसान से चर्चा की, उन्होंने कहा,
"किसान सम्मान निधि से थोड़ी सहायता मिलती है, लेकिन खेती की बढ़ती कीमतों के मुकाबले यह पर्याप्त नहीं है।"
इसी तरह, एक महिला ने साझा किया कि उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन मिलने से उन्हें सुविधा मिली है, लेकिन सिलेंडर भरवाने की लागत कई परिवारों के लिए एक मुश्किल स्थिति पैदा कर रही है।
कई लोगों ने योजनाओं के फायदों को स्वीकार किया है, लेकिन उनके क्रियान्वयन में उपस्थित समस्याओं की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। कुछ ने लाभार्थियों की सूची से नाम गायब होने की शिकायत की, जबकि अन्य ने सेवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठाए। यह दर्शाता है कि किसी योजना का असर केवल उसके आरंभिक लॉन्च पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इसके वास्तविक उपयोग और पहुंच पर भी उसके प्रभाव के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
स्वतंत्र नीति विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सरकारी योजना की सफलता को परखने के लिए तीन मुख्य मानदंड होते हैं—
पहला, कितने लोगों को इस योजना का लाभ मिला;
दूसरा, इस पर कितना धन व्यय किया गया;
और तीसरा, लोगों के जीवन में कितना वास्तव में परिवर्तन आया।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि कई बार सरकारें अपनी सफलताओं का मूल्यांकन लाभार्थियों की संख्या, खर्च किए गए बजट और निर्मित ढांचों के आधार पर करती हैं। दूसरी ओर, नागरिक इन उपलब्धियों का आकलन अपनी सुख-सुविधा, आय, जीवन स्तर और सेवाओं की गुणवत्ता के संदर्भ में करते हैं। उदाहरण के लिए, एक नया अस्पताल सरकार की उपलब्धि हो सकता है, लेकिन उसके प्रभाव का आकलन तब किया जा सकेगा जब यह देखा जाएगा कि वहां पर्याप्त डॉक्टर और दवाएं मौजूद हैं या नहीं।
जब हमने युवाओं से सरकारी योजनाओं पर उनके विचार जाने, तो एक छात्र ने कहा,
"सफलता का मतलब केवल योजना का शुरू होना नहीं है। यदि योजना से लोगों की समस्याएं कम हुई हैं, तभी इसे सफल माना जा सकता है।"
यह टिप्पणी इस पूरे मुद्दे का सबसे सीधा और स्पष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, लोकतंत्र में सरकार और जनता दोनों की भूमिकाएं अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं। सरकार नीतियों का निर्माण करती है, संसाधनों को उपलब्ध कराती है और प्रगति का आंकड़ा प्रस्तुत करती है। इसी बीच, नागरिक यह दर्शाते हैं कि उन नीतियों का असली असर क्या है। जब दोनों के बीच संवाद कायम रहता है, तो योजनाओं की गुणवत्ता और प्रभाव दोनों बेहतर हो जाता है।
हमारी बातचीत का निष्कर्ष यह निकला कि किसी योजना की सफलता का आकलन केवल सरकार या केवल जनता द्वारा नहीं किया जा सकता। सरकारी आंकड़े यह दर्शाते हैं कि क्या कार्यान्वित किया गया है, लेकिन अंतिम रूप से लाभार्थियों का अनुभव यह बताता है कि वह कितनी प्रभावी रही है।
आखिरकार, किसी भी योजना की असली कसौटी सरकारी कार्यप्रणाली में निहित होती है।
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