धमकी के साये में सच की पत्रकारिता: मथुरा न्यूरो हॉस्पिटल की पोल खुलते ही संपादक को फोन पर डराने की कोशिश

Dec 21, 2025 - 17:47
धमकी के साये में सच की पत्रकारिता: मथुरा न्यूरो हॉस्पिटल की पोल खुलते ही संपादक को फोन पर डराने की कोशिश

मथुरा। बिना पंजीकरण 8 माह से संचालित मथुरा न्यूरो हॉस्पिटल की सच्चाई उजागर होना शायद कुछ लोगों को इतना नागवार गुज़रा कि अब सवालों के जवाब देने के बजाय धमकी का रास्ता चुना जा रहा है। मानवाधिकार फास्ट न्यूज  में प्रकाशित खबर के बाद हॉस्पिटल से जुड़े एक व्यक्ति ने संपादक के फोन पर 8171371110 से दिनांक 21 दिसंबर 2025 को दोपहर 01:57 पर व्हाट्सएप्प कॉल की। जब इस नंबर को ट्रूकॉलर पर चैक किया तो पिंकु ठाकुर दर्शा रहा था। पिंकु ठाकुर द्वारा समाचार पत्र के संपादक को व्हाट्सएप्प कॉल कर धमकी भरे लहजे में दबाव बनाने का गंभीर प्रकरण सामने आया है। 

पिंकु ठाकुर द्वारा संपादक से की गयी फोन पर की गयी वार्तालाप के कुछ अंश :

पिंकु ठाकुर : बीरपाल जी बोल रहे हैं,

संपादक : जी बात कर रहा हूं

पिंकु ठाकुर : मैं मथुरा न्यूरो हॉस्पीटल से बोल रहा हूं।

संपादक : जी बताइये

पिंकु ठाकुर : क्या आप अस्पताल आये थे ?

संपादक : क्यों ?

पिंकु ठाकुर : आपके अखबार में खबर लगी है, अखबार हॉस्पीटल में आया है, क्या अखबार की कॉपी आपने भिजवायी है।  

संपादक : अखबार बांटने का काम हॉकर का है, हो सकता है वह वहां गया होगा।

पिंकु ठाकुर : जो खबर लगी है संवाददाता का नाम आपका है, तो आपके बिना तो खबर लग नहीं सकती है।  

संपादक : हां तो आप यह सवाल कीजिए कि खबर आपने लगायी है या नहीं।

पिंकु ठाकुर (धमकी भरे लहजे में) : क्या यह खबर सही है जो आपने लगायी है, आपने हॉस्पीटल से आके पूछा, वेरीफिकेशन किया कि पेपर फॉरमेलिटी पूरी है या नहीं है।

संपादक : सीएमओ से पूछा उन्होंने कहा कि पंजीकरण नहीं है।

पिंकु ठाकुर : सीएमओ ने ये बोल दिया कि रजिस्ट्रेशन नहीं है।

संपादक : हां जी बोल दिया।

पिंकु ठाकुर : अच्छा सिर्फ मथुरा न्यूरो के लिए ही बोला था या और भी किसी के लिए बोला था, शोभित है, मथुरा हार्ट है, और भी हैं….

संपादक : और भी हॉस्पीटल की जानकारी मिली है।

पिंकु ठाकुर (धमकी भरे लहजे में) : 46 हॉस्पीटल हैं उसमें आपको सबसे पहले मथुरा न्यूरो हॉस्पीटल ही मिला था खबर छापने के लिए।  

संपादक : अभी आप यह कह रहे थे कि आपने वेरीफिकेशन की है हॉस्पीटल में आकर अब आप यह कह रहे हैं कि 46 हॉस्पीटल हैं बिना पंजीकरण के आप अब दो बातें क्यों कर रहे हैं ?

पिंकु ठाकुर के फोन पर किसी दूसरे व्यक्ति की आवाज में अन्य शख्स : हॉस्पीटल में आकर वेरीफिकेशन करेंगे या नहीं करेंगे आप, बिना वेरीफिकेशन के ही छाप दिया, आपने हॉस्पीटल में आकर देखा कि बिना रेडियोलोजिस्ट के जांच दे रहे हैं।  

संपादक : सीएमओ से आधिकारिक तौर से पक्ष पूछने के बाद ही खबर को प्रकाशित किया गया है। आपसे मैं ज्यादा बहस तो नहीं करूंगा यदि आपको खबर से कोई आपत्ति है तो आप माननीय न्यायालय सबके लिए है आप वहां जा सकते हैं और वाद दायर कर सकते हैं।

पिंकु ठाकुर (धमकी भरे लहजे में आदेशित करते हुए) : सुनो मेरी बात सुनो बीरपाल जी आप मथुरा न्यूरो हॉस्पीटल आईए और यहां बैठकर बात करिये आकर ठीक है ना आप चाहे कहीं भी रहते हों आपने खबर लगायी है तो एक बार अस्पताल में आकर हमसे बात करिये।

संपादक : फोन पर बात बहुत अच्छी हो रही हैं न आने की क्या आवश्यकता है ?

पिंकु ठाकुर (धमकी भरे लहजे में) : फोन पर अच्छी हो रही हैं तो आप यह खबर छाप कर क्या दिखाना चाहते, क्या शो कर रहे हो।

संपादक : यह जो भी खबर प्रकाशित की है सीएमओ से बात की है, पंजीकरण पटल में बात की है, तब यह खबर प्रकाशित की है।

पिंकु ठाकुर (धमकी भरे लहजे में) : यदि किसी के बारे में कुछ छाप रहे तो एक बार बैठ कर बात तो कर सकते हो न उससे, अस्पताल में आकर बात नहीं करोगे क्या ?

संपादक : आपका निजी अस्पताल है मैंने संबंधित अधिकारी सीएमओ से बात करके ही खबर प्रकाशित की है।

पिंकु ठाकुर : भैया मुझे मत बताओ मैंने भी 12 साल पत्रकारिता की है, मैं सबको अच्छी तरीके से जानता हूं और यह भी जानता हूं किस तरीके से किस किस से वो बात करते हैं।

संपादक : जब सब कुछ जानते ही हैं तो फिर इतना आपसे मुझसे क्यों बहस कर रहे हैं श्रीमान।

पिंकु ठाकुर (धमकी भरे लहजे में) : तभी तो मैं कह रहा हूं आपसे आप कह रहे हैं फोन बहुत अच्छी बात हो रही हैं, तो बैठ कर बात करने में क्या दिक्कत है

संपादक : यदि आपको बैठ कर ही बात करनी है तो आप मेरे घर पर आ जाइए।

पिंकु ठाकुर : जब आप मेरे हॉस्पीटल में पर नहीं आ सकते हैं तो मैं आपके घर पर कैसे आकर बात कर लूं, आप घर में रहते हैं ?

संपादक : घर में रहते हैं मतलब !

पिंकु ठाकुर : लोहवन से हैं आप ?

संपादक : मैं लोहवन बगीची यमुना विहार कॉलोनी में रहता हूं,  अधिकांश ग्रेटर नोएडा में रहता हूं।

पिंकु ठाकुर : बडे पत्रकार हैं आप, धमकी देते हैं आप…

संपादक : मेरी बात सुनिये

पिंकु ठाकुर (धमकी भरे लहजे में) : क्या सुनूं मैं तुम्हारी, आप खबर छाप रहे हैं, ऐसा है मैं नोएडा आकर ही मिलता हूं आपसे आज शाम तक मेरा फोन उठा लेना। 

खबर से बौखलाहट, फोन पर ‘फैसला’ कराने की कोशिश

जैसे ही अखबार की प्रतियां मथुरा शहर में वितरित हुईं, उसी दिन संपादक के पास पिंकु ठाकुर का फोन आया। बातचीत की शुरुआत सामान्य पूछताछ से हुई, लेकिन कुछ ही पलों में यह आरोप, सवाल और धमकी में बदल गई।
“आप अस्पताल क्यों नहीं आए? आपने वेरीफिकेशन क्यों नहीं किया?”—जैसे सवालों के जरिए यह साबित करने की कोशिश की गई कि खबर जानबूझकर छापी गई है।

“46 अस्पताल हैं, सबसे पहले यही क्यों?”-  सवाल या दबाव?

फोन पर पिंकु ठाकुर ने यह तक कहा कि जिले में 46 अस्पताल बिना पंजीकरण के हैं, फिर खबर के लिए “सबसे पहले मथुरा न्यूरो हॉस्पिटल ही क्यों चुना गया?”
यहीं बातचीत ने खतरनाक मोड़ ले लिया—यह सवाल नहीं, बल्कि दबाव बनाने की रणनीति प्रतीत हुई, ताकि खबर की साख पर ही सवाल खड़े किए जा सकें।

“अस्पताल आइए, बैठकर बात करते हैं”  - सच या समझौता?

बार-बार संपादक को अस्पताल बुलाने पर ज़ोर दिया गया “खबर छापी है तो अस्पताल आकर हमसे बात करिए।”
संपादक ने साफ कहा कि खबर सीएमओ और पंजीकरण पटल से आधिकारिक पुष्टि के बाद प्रकाशित की गई है। इसके बावजूद, फोन पर यह दोहराया जाता रहा कि “फोन पर नहीं, बैठकर बात होनी चाहिए।”

निजी जानकारी का ज़िक्र, धमकी की सीमा पार

बातचीत के दौरान पिंकु ठाकुर द्वारा संपादक के निवास स्थान का उल्लेख करना और यह कहना कि “मैं नोएडा आकर आपसे मिलता हूं, आज शाम तक फोन उठाते रहना” स्पष्ट तौर पर धमकी और डराने की श्रेणी में आता है। यह न सिर्फ पत्रकार की स्वतंत्रता पर हमला है, बल्कि कानून व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।

“12 साल पत्रकारिता की है” – अनुभव या ढाल?

पिंकु ठाकुर ने कहा कि 12 साल पत्रकारिता की है, वह “सबको जानता है”। सवाल यह है कि यदि 12 साल की पत्रकारिता की है, तो क्या उसी अनुभव के बल पर बिना पंजीकरण अस्पताल चलाने का नैतिक अधिकार मिल जाता है?

सवाल अब सिर्फ अस्पताल का नहीं

यह मामला अब केवल मथुरा न्यूरो हॉस्पिटल तक सीमित नहीं रहा। यह सच लिखने की कीमत, स्वतंत्र पत्रकारिता पर दबाव, और धमकी की राजनीति का मामला बन चुका है। जब नियमों पर सवाल उठाए जाते हैं, तो जवाब नियमों से आने चाहिए फोन कॉल की धमकियों से नहीं।

अब निगाहें प्रशासन पर
सबसे बड़ा सवाल यही है
•    क्या एक पत्रकार को सच लिखने पर डराया जाएगा?
•    क्या बिना पंजीकरण अस्पताल चलाने वालों के बजाय, खबर लिखने वालों पर दबाव डाला जाएगा?
•    और क्या स्वास्थ्य विभाग व प्रशासन इस धमकी प्रकरण का स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई करेगा?
यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की परीक्षा है “जहां सच बोलना अपराध न बन जाए।”

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