अवैध अस्पतालों पर सवाल, मथुरा स्वास्थ्य विभाग कटघरे में
मथुरा में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति एक बार फिर सवालों के घेरे में है। जनपद में बड़ी संख्या में ऐसे अस्पताल संचालित हो रहे हैं जिनका स्वास्थ्य विभाग में कोई वैध पंजीकरण नहीं है, इसके बावजूद इन अस्पतालों में इलाज, भर्ती और आईसीयू जैसी सुविधाओं के नाम पर मरीजों से मोटी रकम वसूली जा रही है। इस स्थिति ने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि आम नागरिकों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा कर दी है।
सूत्रों के अनुसार मथुरा जनपद में करीब 50 ऐसे अस्पताल हैं जो नियमों को ताक पर रखकर संचालित हो रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग का दायित्व है कि वह समय-समय पर इन अस्पतालों का सत्यापन करे, लेकिन जमीनी स्तर पर निगरानी की कमी साफ दिखाई दे रही है। आम आदमी जब मेडिकल इमरजेंसी की स्थिति में अस्पताल पहुंचता है, तो उसके पास यह जांचने का कोई साधन नहीं होता कि अस्पताल पंजीकृत है या नहीं, वहां कार्यरत चिकित्सक योग्य हैं या नहीं। यह जिम्मेदारी पूरी तरह से प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की होती है।
ताजा मामला थाना शेरगढ़ क्षेत्र के अगरयाला गांव निवासी लाखन से जुड़ा है। 12 जनवरी 2026 की रात अचानक तबीयत बिगड़ने पर उनके भतीजे विक्रम उन्हें गोवर्धन चौराहा स्थित ग्लोबल प्लस हॉस्पीटल लेकर पहुंचे। विक्रम ने अस्पताल में भर्ती के दौरान आयुष्मान कार्ड प्रस्तुत किया, लेकिन अस्पताल कर्मियों द्वारा यह कहकर नकद भुगतान कराया गया कि उस दिन आईसीयू का खर्च देना होगा और अगले दिन आयुष्मान कार्ड से इलाज किया जाएगा। आरोप है कि इसके बाद अलग-अलग क्यूआर कोड के माध्यम से लगातार पैसे वसूले गए।
बाद में जानकारी सामने आई कि संबंधित अस्पताल का पंजीकरण वैध नहीं है। हैरानी की बात यह है कि गोवर्धन चौराहा मथुरा का एक प्रमुख और व्यस्त क्षेत्र है, इसके बावजूद लंबे समय से अवैध रूप से अस्पताल का संचालन होता रहा। इस पर स्थानीय लोगों ने भी स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।
पीड़ित विक्रम ने मामले की शिकायत मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 पर भी दर्ज कराई। शिकायत दर्ज होने के बावजूद अभी तक कोई ठोस कार्रवाई या सुनवाई नहीं होने की बात कही जा रही है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायतों को भी जिला स्तर पर गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है।
इस पूरे प्रकरण में पंजीकरण पटल के प्रभारी एवं एसीएमओ डॉ अनुज चौधरी की भूमिका पर भी प्रश्नचिह्न लगे हैं। वर्ष 2024–25 में ग्लोबल प्लस हॉस्पीटल पंजीकृत था, लेकिन जिन चिकित्सकों को फुल टाइम दर्शाया गया, वे वास्तव में वहां कार्यरत नहीं थे। डॉ वर्तुल गुप्ता, डॉ मुकुंद मुंद्रा, डॉ फुजैल और डॉ मदन गोपाल के नाम दस्तावेजों में दर्ज पाए गए। मीडिया द्वारा संपर्क करने पर इन चिकित्सकों ने स्पष्ट किया कि उन्होंने न तो कोई दस्तावेज दिए थे और न ही उन्हें इस अस्पताल से जुड़े होने की जानकारी थी।
अब सवाल यह है कि पंजीकरण के समय इन दस्तावेजों का सत्यापन कैसे किया गया। क्या चिकित्सकों से प्रत्यक्ष या फोन पर पुष्टि की गई, क्या उनके हस्ताक्षरों और अनुबंधों की जांच हुई, या फिर औपचारिकता के तौर पर पंजीकरण कर दिया गया। सूत्रों का दावा है कि अस्पतालों के पंजीकरण और नवीनीकरण की प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हैं, जिनकी जांच आवश्यक है।
मामले में मुख्य चिकित्सा अधिकारी का कहना है कि पूरे प्रकरण की जांच कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, अब देखने वाली बात यह होगी कि जांच सिर्फ कागजों तक सीमित रहती है या वास्तव में अवैध अस्पतालों पर कार्रवाई होती है। साथ ही यह भी सवाल बना हुआ है कि क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी और पीड़ित को न्याय मिल पाएगा।
इस प्रकरण ने एक बार फिर मथुरा के स्वास्थ्य तंत्र की पारदर्शिता और कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब अब प्रशासन को देना होगा।
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