अवैध कॉलोनी पर एमवीडीए की कारवाई हुई बेअसर, फिर से बेखौफ किए जा रहे कॉलोनी में अवैध निर्माण
ब्यूरो।
मथुरा। मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (एमवीडीए) द्वारा अवैध कॉलोनियों के खिलाफ चलाए जाने वाले अभियानों की सच्चाई एक बार फिर सामने आ गई है। सोमवार, 22 दिसंबर 2025 को यमुनापार डंपिंग यार्ड के समीप बलदेव रोड पर श्रीमान पैलेस के सामने विकसित की जा रही एक अवैध कॉलोनी पर की गई कार्रवाई अब केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। बुल्डोजर तो चला, लेकिन अवैध निर्माण पर न तो ब्रेक लगा और न ही कॉलोनाइज़र के हौसले पस्त हुए।
प्राधिकरण के उपाध्यक्ष एवं सचिव के निर्देश पर पहुंची एमवीडीए की टीम ने कॉलोनी को अवैध बताते हुए कुछ प्लॉटों की बाउंड्री, बिजली के कुछ खंभे तथा कॉलोनी के अंदर बनाई गई कच्ची-पक्की सड़कों को ध्वस्त किया। बताया गया कि यह कॉलोनी योगेश पुजारी व उनके सहयोगियों द्वारा बिना किसी मानचित्र स्वीकृति और लेआउट पास कराए विकसित की जा रही थी, जो नियमानुसार पूर्णतः अवैध श्रेणी में आती है।
कार्रवाई के बाद खुली प्राधिकरण की सख्ती की पोल
बुल्डोजर कार्रवाई के बाद उम्मीद की जा रही थी कि अवैध निर्माण रुकेंगे, लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट है। स्थानीय लोगों के अनुसार, कार्रवाई के अगले ही दिन से कॉलोनी में फिर से निर्माण कार्य शुरू हो गया और अब तो निर्माण की रफ्तार पहले से कहीं अधिक तेज हो गई है। प्लॉटों पर नींव डाली जा रही है, दीवारें खड़ी हो रही हैं और निर्माण सामग्री खुलेआम डाली जा रही है, मानो किसी तरह की कार्रवाई का कोई भय ही न हो।
सूत्रों की मानें तो इस अवैध कॉलोनी को लंबे समय तक संरक्षण मिलता रहा। आरोप है कि क्षेत्र के तत्कालीन अवर अभियंताओं की मिलीभगत के चलते अब तक इस पर कोई कठोर कार्रवाई नहीं हो सकी। बताया जा रहा है कि प्राधिकरण तक शिकायतें पहले भी पहुंची थीं, लेकिन उन्हें नजरअंदाज किया जाता रहा। अंततः किसी जनशिकायत के दबाव में आकर आंशिक कार्रवाई की गई, ताकि यह दिखाया जा सके कि प्राधिकरण अपना दायित्व निभा रहा है।
जनहित या खानापूर्ति?
यदि एमवीडीए वास्तव में अवैध निर्माणों को लेकर गंभीर होता, तो कॉलोनी की पूरी लेआउट ध्वस्त की जाती, प्लॉटिंग पर तत्काल रोक लगाई जाती और कॉलोनाइज़र के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया जाता। लेकिन आधी-अधूरी कार्रवाई से न तो अवैध कॉलोनी समाप्त होती है और न ही नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कोई प्रभाव पड़ता है। उल्टा, ऐसे अभियानों से कॉलोनाइज़र को यह संदेश मिलता है कि थोड़ी बहुत तोड़फोड़ के बाद सब कुछ फिर से सामान्य हो जाएगा।
आम जनता के साथ हो रहा है धोखा
सबसे बड़ा नुकसान उन आम लोगों का हो रहा है, जो सस्ते प्लॉट के लालच में अपनी जीवनभर की कमाई इन अवैध कॉलोनियों में लगा रहे हैं। उन्हें न तो यह बताया जाता है कि कॉलोनी प्राधिकरण से स्वीकृत नहीं है और न ही यह चेतावनी दी जाती है कि भविष्य में यहां कभी भी ध्वस्तीकरण की कार्रवाई हो सकती है। जब बुल्डोजर दोबारा चलता है, तब सबसे ज्यादा नुकसान इन्हीं निर्दोष खरीदारों को उठाना पड़ता है।
कानून स्पष्ट, लेकिन अमल सवालों में
नियमों के अनुसार, बिना स्वीकृत मानचित्र और लेआउट के किया गया कोई भी निर्माण कभी भी गिराया जा सकता है, चाहे वह वर्षों पुराना ही क्यों न हो। इसके बावजूद यदि अवैध कॉलोनियों पर समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो यह कानून की खुली अवहेलना मानी जाएगी।
अब देखना यह होगा कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण इस मामले में दोबारा सख्त कार्रवाई कर अवैध कॉलोनाइज़र पर नकेल कसता है या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा। सवाल यह भी है कि क्या जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच होगी, या फिर मिलीभगत के आरोप यूं ही हवा में उड़ते रहेंगे।
फिलहाल तो हालात यही बता रहे हैं कि बुल्डोजर चला जरूर, लेकिन कॉलोनाइजर के हौसले अब भी बुलंद है।
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