डॉक्टर नहीं, 'यमराज' हैं ये! चंद रुपयों के लिए ले ली निशा की जान | CMO साहब जागिये! आपके नाक के नीचे चल रहा 'मौत का व्यापार'
ब्यूरो।
मथुरा। स्वास्थ्य सुविधा को संविधान ने मूलभूत अधिकार माना है, लेकिन मथुरा की यह घटना बताती है कि स्वास्थ्य व्यवस्था खुद इतनी बीमार हो चुकी है कि अब उसे इलाज की ज़रूरत है। आज हम आपको अस्पतालों के उन काले कारनामों से रूबरू करा रहे हैं, जिन्हें जानकर शायद आप भी अंदर तक झकझोर जाएं। यह कहानी है एक ऐसी महिला की, जिसे बचाने के बजाय अस्पतालों ने कमाई का साधन बना लिया और अंत में उसकी जान चली गई।
मामला मथुरा जनपद का है। मृतका का नाम निशा सैनी है, जिनके पति सहदेव हैं। निशा की शादी राजस्थान के डीग में हुई थी और उनका मायका मथुरा के सदर क्षेत्र में है। निशा आठ महीने की गर्भवती थीं और उनका इलाज लक्ष्मीनगर यमुनापार निवासी नर्स पुष्पा द्वारा किया जा रहा था। परिजनों का आरोप है कि गर्भावस्था के दौरान ही पुष्पा नर्स ने निशा से इलाज के नाम पर मोटी रकम वसूल ली।
3 जनवरी 2026 की तारीख निशा के लिए सबसे दर्दनाक साबित हुई। जब उन्हें लेबर पेन शुरू हुआ तो परिजन उन्हें सबसे पहले पुष्पा नर्स के पास लेकर गए। इसके बाद पुष्पा नर्स ने निशा को यमुनापार राया रोड स्थित चौधरी हॉस्पिटल एंड ट्रॉमा सेंटर में सुबह करीब 10 बजे भर्ती करा दिया। यहीं से शुरू हुआ लूट और लापरवाही का वह सिलसिला, जिसने आखिरकार निशा की जान ले ली। अस्पताल में भर्ती करते ही परिजनों से करीब 20 हजार रुपये जमा कराए गए।
उस वक्त अस्पताल में डॉ. एच.एन. प्रभाकर और डॉ. शिवानी वर्मा मौजूद थे। शाम करीब 6 बजे निशा का ऑपरेशन कर दिया गया और उसने एक बच्ची को जन्म दिया। सूत्रों के मुताबिक, ऑपरेशन करने वाला डॉक्टर अस्पताल का नहीं था, बल्कि किसी अन्य अस्पताल से बुलाया गया था, जो ऑपरेशन के बाद चला गया। इसके बाद निशा को ICU में रखने के बजाय जनरल वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया, जबकि उसकी ब्लीडिंग लगातार जारी थी।
परिजनों का कहना है कि ब्लीडिंग न रुकने पर डॉ. शिवानी वर्मा ने बच्चेदानी निकालने की बात कही। इसके बाद उसी एनेस्थीसिया में निशा का दोबारा ऑपरेशन किया गया और उसकी बच्चेदानी निकाल दी गई। यह दूसरा ऑपरेशन शाम करीब 8 बजे किया गया। इसके बाद निशा की हालत और बिगड़ने लगी।
स्थिति गंभीर होने पर डॉ. एच.एन. प्रभाकर ने निशा को राया रोड स्थित ही डॉ. मेघा चौधरी मेमोरियल भास्कर हॉस्पिटल के ICU में भर्ती कराया। यहां भर्ती से पहले फिर 30 हजार रुपये जमा कराए गए। दवाइयों और ऑनलाइन ट्रांजेक्शन के नाम पर इस अस्पताल में परिजनों से करीब 60 हजार रुपये वसूल लिए गए। सवाल यह है कि सिर्फ 6 घंटे के ICU इलाज के लिए 60 हजार रुपये, वो भी एक गरीब परिवार से — यह अस्पताल है या कोई लग्ज़री होटल?
रात करीब 2 बजे तक निशा की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। इसके बाद भास्कर हॉस्पिटल ने बिना किसी रेफर लेटर या मेडिकल फाइल के निशा को आगरा के मल्होत्रा हॉस्पिटल रेफर कर दिया। परिजनों का आरोप है कि उनसे कहा गया — “अगर बचा सकते हो तो आगरा ले जाओ, हमारी बात हो गई है।” यानी पैसा लेकर मरीज को ऐसे रवाना कर दिया गया, जैसे उसकी ज़िंदगी से कोई मतलब ही न हो।
4 जनवरी 2026 को निशा को आगरा ले जाया गया, जहां दोपहर 2 बजे तक उसे रखा गया। यहां भी करीब 30 से 40 हजार रुपये खर्च हो गए। बाद में मल्होत्रा हॉस्पिटल से निशा को भरतपुर के सरकारी अस्पताल आरबीएम रेफर किया गया। शाम करीब 4 बजे वहां पहुंचने पर डॉक्टरों ने निशा को मृत घोषित कर दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में साफ लिखा है — “डिलीवरी के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव होने से मृत्यु।”
इस घटना में सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि निशा की मौत के कुछ दिन बाद उसकी नवजात बच्ची की भी मौत हो गई। आज निशा के दो छोटे बच्चे अपनी मां को ढूंढ रहे हैं, जिन्हें शायद कभी यह पता नहीं चलेगा कि उनकी मां की मौत लापरवाही और लालच का नतीजा थी।
अब अगर डॉ. एच.एन. प्रभाकर की पृष्ठभूमि देखें तो और भी चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। उनका पूरा नाम हरि नारायण प्रभाकर है। वे मथुरा जिला अस्पताल में इमरजेंसी मेडिकल ऑफिसर रह चुके हैं और फिलहाल निलंबित हैं। मई 2025 में वे रिश्वत कांड में जेल भी जा चुके हैं। इस मामले में उनकी पत्नी डॉ. शिवानी वर्मा, एक फार्मासिस्ट और एक ड्राइवर की भी गिरफ्तारी हुई थी। आरोप था कि यूपी पुलिस भर्ती में अभ्यर्थियों को पास कराने के लिए रिश्वत लेकर फर्जी मेडिकल प्रमाण पत्र बनाए गए थे। पुलिस ने उनके पास से नकदी, मोबाइल फोन और भर्ती से जुड़े दस्तावेज बरामद किए थे।
इतना ही नहीं, डॉ. प्रभाकर के नाम पर चंदनवन क्षेत्र में प्रभाकर हॉस्पिटल भी संचालित है। आरोप है कि दोनों अस्पतालों में डॉ. शिवानी वर्मा ने फुल-टाइम ड्यूटी के दस्तावेज जमा कर रखे हैं, जो नियमों के खिलाफ है।
परिजनों का कहना है कि इस पूरे मामले की शिकायत 23 जनवरी 2026 को CMO मथुरा से की गई, लेकिन चार दिन तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। इससे पहले भी मथुरा के कई अवैध अस्पतालों को लेकर खबरें सामने आ चुकी हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग आंख मूंदे बैठा है। सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य विभाग की अस्पताल संचालकों से सांठगांठ है? क्या गरीब की जान इतनी सस्ती हो चुकी है?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि निशा के परिजनों को इंसाफ मिलेगा या नहीं, और क्या मथुरा की स्वास्थ्य व्यवस्था कभी इस नींद से जागेगी?
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