मथुरा में बड़ा 'अस्पताल घोटाला': आवासीय भवन में चल रहा 'मथुरा न्यूरो हॉस्पिटल', व्हाट्सएप पर फोटो मिलने के बाद भी सोता रहा आवास विकास तंत्र
मुख्य बिंदु : कागजों में रहने का मकान (आवासीय भवन), लेकिन ऑन-ग्राउंड सालों से धड़ल्ले से चल रहा है सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल. सुरक्षा नियमों की उड़ी धज्जियां: नियमों के खिलाफ जाकर बेसमेंट (तहखाने) में भर्ती किए जा रहे हैं गंभीर मरीज। इतिहास से नहीं लिया सबक: लखनऊ अलीगंज के ताजा कोचिंग सेंटर अग्निकांड (15 मौतें) और दिल्ली के हादसों को भूलकर फिर बड़े वीभत्स हादसे की पटकथा लिख रहा है प्रशासन. तारीखों के साथ खुलासा: सितंबर 2025 से मई 2026 तक व्हाट्सएप पर तस्वीरें भेजने के बाद भी जेई, एई और एक्सियन ने नहीं रुकवाया अवैध निर्माण। बड़ा विरोधाभास: वृंदावन अग्निकांड पर 'बांके बिहारी की कृपा' बताने वाले डीएम चंद्र प्रकाश सिंह ने अवैध अस्पताल संचालक को स्टेज पर दिया अवार्ड। ऑन-रिकॉर्ड टालमटोल: 22 जून को दोपहर 3:40 बजे फोन करने पर मीटिंग का बहाना बनाकर भागे अधिशासी अभियंता सूरजपाल।
मथुरा। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी मथुरा के राधिका विहार में नेशनल हाईवे पर स्थित 'मथुरा न्यूरो सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल' इस समय भ्रष्टाचार, प्रशासनिक लापरवाही और जनहानि के बड़े खतरे का जीता-जागता केंद्र बन चुका है। बाहर से चमचमाती इमारत और आधुनिक चिकित्सा का दावा करने वाले इस अस्पताल का कड़वा सच बेहद खौफनाक है। सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, जिस आलीशान इमारत में यह अस्पताल संचालित हो रहा है, उसका नक्शा आवास विकास परिषद से एक 'आवासीय भवन' (रहने का मकान) के रूप में पास कराया गया था। लेकिन नियमों को ठेंगे पर रखकर सालों से यहाँ करोड़ों का व्यावसायिक खेल खेला जा रहा है।
बारूद के ढेर पर मरीज: बेसमेंट में चल रहा भर्ती का खेल
लापरवाही और नियमों के उल्लंघन की पराकाष्ठा यहीं खत्म नहीं होती। अस्पताल प्रबंधन द्वारा अस्पताल के बेसमेंट (तहखाने) में मरीजों को भर्ती किया जाता है। सुरक्षा मानकों और कानून के लिहाज से बेसमेंट में मरीजों को रखना किसी बड़े वीभत्स हादसे को खुली दावत देना है। इस गंभीर मुद्दे पर जब द तहलका खबर ने मथुरा के मुख्य अग्निशमन अधिकारी (CFO) से बात की, तो उनका एक रटा-रटाया और गैर-जिम्मेदाराना जवाब सामने आया कि— "यदि बेसमेंट में मरीज भर्ती हैं, तो मैं एक बार दिखवा लेता हूँ।" सवाल यह उठता है कि क्या विभाग किसी बड़े हादसे के बाद ही नींद से जागेगा?
साठगांठ की क्रोनोलॉजी: व्हाट्सएप पर सबूत, फिर भी कुंभकर्णीय नींद में अधिकारी
यह अवैध साम्राज्य आवास विकास परिषद के भ्रष्ट तंत्र और रसूखदारों के सिंडिकेट का सबसे बड़ा सबूत है। इस पूरे खेल की टाइमलाइन पर गौर करें:
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सितंबर 2025: अस्पताल की दूसरी मंजिल पर बिना किसी सरकारी स्वीकृति के अवैध निर्माण कार्य शुरू हुआ। क्षेत्रीय अवर अभियंता (JE) नवीन कुमार और सहायक अभियंता (AE) कृपांशू द्विवेदी को पल-पल की जानकारी दी गई, लेकिन कार्रवाई शून्य रही।
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जनवरी और फरवरी 2026: सीधे अधिशासी अभियंता (XEN) सूरजपाल को इस अवैध निर्माण से अवगत कराया गया, लेकिन कोई कदम नहीं उठाया गया।
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मई 2026: अधिशासी अभियंता सूरजपाल के व्हाट्सएप पर बकायदा इस अवैध निर्माण की लाइव तस्वीरें भेजी गईं। सबूत मोबाइल स्क्रीन पर तैरते रहे, लेकिन साहब ने काम नहीं रुकवाया।
नियमों के मुताबिक अपने क्षेत्र में किसी भी आवासीय भवन में कमर्शियल एक्टिविटी और अवैध निर्माण को रोकना जेई नवीन कुमार, एई कृपांशू द्विवेदी और अधिशासी अभियंता सूरजपाल की प्राथमिक जिम्मेदारी थी, लेकिन पूरा तंत्र कुंभकर्णी नींद सोता रहा और आज वह अवैध निर्माण लगभग पूरा हो चुका है।
22 जून, शाम 3:40 बजे: फोन पर खुली पोल, मीटिंग का बहाना बनाकर भागे एक्सईएन
अधिकारियों की घोर लापरवाही का सबसे पुख्ता सबूत 22 जून को शाम ठीक 3 बजकर 40 मिनट पर ऑन-रिकॉर्ड दर्ज हुआ। जब द तहलका खबर ने अधिशासी अभियंता सूरजपाल को फोन मिलाया और सीधा सवाल किया कि 'मथुरा न्यूरो' पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? तो उन्होंने पुराना राग अलापते हुए कहा कि 'लैंड यूज चेंज की फाइल चल रही है'।
जब संवाददाता ने उन्हें घेरा और पूछा कि— "क्या सिर्फ आवेदन करने से अस्पताल संचालन की अनुमति मिल जाती है? व्हाट्सएप पर फोटो मिलने और सालों से नाक के नीचे अवैध अस्पताल चलने पर आपकी आंखें क्यों बंद रहीं?"— तो इस तीखे सवाल पर एक्सियन साहब की बोलती बंद हो गई। उन्होंने तुरंत 'मीटिंग' का बहाना बनाया और फोन काटना ही बेहतर समझा। साफ़ है कि जब सबूतों के साथ सवाल दागे जाते हैं, तो जिम्मेदार अधिकारी जवाब देने के बजाय मीटिंगों के पीछे छिप जाते हैं।
ताजा लखनऊ कोचिंग अग्निकांड और दिल्ली के होटल हादसे: क्या फिर लाशें गिरने का इंतजार है?
मथुरा न्यूरो की इस भयानक लापरवाही को देखकर देश को दहला देने वाले वो मंजर याद आते हैं, जिनसे शायद इस अंधे और बहरे प्रशासनिक तंत्र ने कोई सबक नहीं सीखा।
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लखनऊ का ताजा 'अलीगंज कोचिंग अग्निकांड' (22 जून 2026): अभी कल ही लखनऊ के अलीगंज (पुरनिया) इलाके में एक तीन मंजिला कमर्शियल कॉम्प्लेक्स में बने एनीमेशन कोचिंग सेंटर में भीषण आग लगी है। सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाने की वजह से 15 मासूम छात्रों की दम घुटने और जलने से मौत हो गई। कई छात्र अपनी जान बचाने के लिए ऊपरी मंजिलों से नीचे कूद गए। यह चीखें अभी शांत भी नहीं हुई हैं और पूरा प्रदेश इस हादसे से थर्राया हुआ है।
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लखनऊ का 'लेवाना होटल अग्निकांड': जहाँ कागजी साठगांठ से बनी अवैध कमर्शियल बिल्डिंग में आग लगने से कई मासूम जिंदगियां धुएं के गुबार में घुटकर खत्म हो गई थीं।
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दिल्ली के होटल और उपहार हादसे: देश की राजधानी दिल्ली के करोल बाग स्थित अर्पित पैलेस होटल का वो भीषण हादसा कौन भूल सकता है, जहाँ अवैध रूप से बढ़ाए गए निर्माण और नियमों की अनदेखी के चलते निर्दोष लोगों को अपनी जान देकर कीमत चुकानी पड़ी थी।
दिल्ली से लेकर लखनऊ तक, जब-जब रिहायशी या अवैध रूप से स्वीकृत इमारतों में ऐसा कमर्शियल खेल खेला गया है, तब-तब मासूमों की लाशों के ढेर लगे हैं। आज मथुरा का प्रशासन भी राधिका विहार में नेशनल हाईवे पर बने 'मथुरा न्यूरो अस्पताल' को खुली छूट देकर लखनऊ और दिल्ली जैसे ही किसी खौफनाक और बड़े वीभत्स हादसे की स्क्रिप्ट तैयार कर रहा है।
फर्जी 'डॉक्टर' का टैग और वृंदावन होटल अग्निकांड की याद
इस पूरे खेल के पीछे अस्पताल के संचालक मनोज रघुवंशी हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि मनोज रघुवंशी अपने नाम के आगे धड़ल्ले से 'डॉक्टर' लिखते हैं, जबकि हकीकत यह है कि वह सिर्फ एक अस्पताल संचालक हैं, कोई डॉक्टर नहीं! जनता और मरीजों को गुमराह करने के लिए यह फर्जी मुखौटा क्यों पहना गया है, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
यह पूरा मामला 11 फरवरी को वृंदावन में हुए उस खौफनाक होटल अग्निकांड की याद दिलाता है, जहां उद्घाटन के दिन ही भीषण आग लग गई थी। तब अपनी खाल बचाने के लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने अगले ही दिन होटल सील किया और एक छोटे कर्मचारी (अवर अभियंता दिनेश कुमार गुप्ता) को सस्पेंड कर पल्ला झाड़ लिया था। ठीक उसी तर्ज पर आज मथुरा न्यूरो हॉस्पिटल में भी सैकड़ों मरीजों और उनके तीमारदारों की जान को एक बारूद के ढेर पर बिठाकर रखा गया है।
सबसे बड़ा विरोधाभास: एक तरफ अवैध संचालन, दूसरी तरफ जिलाधिकारी का अवार्ड!
इस पूरी कहानी का सबसे शर्मनाक पहलू जिला प्रशासन की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा करता है। वृंदावन होटल अग्निकांड के समय खुद जिलाधिकारी चंद्र प्रकाश सिंह ने बयान दिया था कि 'बांके बिहारी की कृपा रही कि कोई जनहानि नहीं हुई'। लेकिन अचरज देखिए कि आपदा में बांके बिहारी की कृपा खोजने वाले वही जिलाधिकारी, 27 फरवरी 2026 को बृजवासी लैंड्स इन में आयोजित 'हिंदुस्तान यंग एचीवर्स' समारोह में मुख्य अतिथि बनकर पहुंचते हैं और अपने ही हाथों से इस अवैध अस्पताल के संचालक मनोज रघुवंशी को अवार्ड देकर सम्मानित करते हैं!
एक तरफ जिला प्रशासन अवैध निर्माण पर कार्रवाई की कागजी बातें करता है, और दूसरी तरफ जिले के सबसे बड़े अधिकारी खुद ऐसे शख्स की पीठ थपथपाते हैं जो सालों से जनता की जिंदगी को दांव पर लगाकर अवैध भवन में अस्पताल चला रहा है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) ने भी इस आवासीय भवन में अस्पताल संचालन की अनुमति कैसे दे दी, यह भी एक बड़ा यक्ष प्रश्न है।
'द तहलका खबर' के तीखे सवाल जिनका जवाब प्रशासन को देना ही होगा:
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क्या सिर्फ लैंड यूज चेंज का आवेदन करने से किसी भी आवासीय कोठी या असुरक्षित बेसमेंट में अस्पताल चलाने का कानूनी हक मिल जाता है?
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कल ही लखनऊ के अलीगंज कोचिंग सेंटर में 15 छात्रों की मौत और दिल्ली के होटल हादसों से सबक लेने के बजाय मथुरा प्रशासन यहाँ किसी बड़ी तबाही का इंतजार क्यों कर रहा है?
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सितंबर 2025 से लगातार सबूत मिलने, मई 2026 में व्हाट्सएप पर फोटो देखने और आज 22 जून को फोन पर मीटिंग का बहाना बनाकर भागने वाले अधिशासी अभियंता सूरजपाल, जेइ नवीन कुमार और एई कृपांशू द्विवेदी पर मुकदमा कब दर्ज होगा?
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क्या जिलाधिकारी स्वयं ऐसे रसूखदारों को पुरस्कृत करके भ्रष्टाचार और अवैध कार्यों को मूक सहमति दे रहे हैं?
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भगवान न करे, अगर कल को इस अस्पताल में कोई बड़ा हादसा या ऊंच-नीच हो गई, तो क्या तब भी किसी छोटे कर्मचारी को बलि का बकरा बनाकर बड़े अधिकारी अपने वातानुकूलित कमरों में सुरक्षित बच निकलेंगे?
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