1997 के ध्वस्तीकरण आदेश से फायर NOC तक... मथुरा न्यूरो हॉस्पिटल पर कार्रवाई अधूरी क्यों? सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बीच उठे बड़े सवाल
31 मार्च 1997 को ध्वस्तीकरण का आदेश, 15 जुलाई 2026 को सिर्फ बेसमेंट सील; 12 अगस्त को फायर अधिकारी ने NOC निरस्त होने की बात कही, 17 अगस्त को रेगुलराइजेशन की कोशिश का दावा
मथुरा। रिहायशी भवनों में नियमों के विपरीत संचालित व्यावसायिक गतिविधियों और अवैध निर्माणों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बीच मथुरा के मथुरा न्यूरो सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल का मामला एक बार फिर सवालों के घेरे में है। मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि उपलब्ध जानकारी के मुताबिक संबंधित भवन के खिलाफ 31 मार्च 1997 को ही ध्वस्तीकरण का आदेश पारित किया जा चुका था, इसके बावजूद आज उसी भवन में अस्पताल संचालित होने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
द तहलका खबर ने इस मामले को पहली बार 23 जून 2026 को प्रमुखता से उठाया था। उस समय राधिका विहार क्षेत्र स्थित भवन में संचालित मथुरा न्यूरो सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल को लेकर भवन के आवासीय उपयोग और उसमें अस्पताल जैसी व्यावसायिक गतिविधि संचालित किए जाने की वैधानिकता पर सवाल उठाए गए थे। आवास विकास परिषद के अधिकारियों से भी स्थिति स्पष्ट करने का प्रयास किया गया था।
इसके बाद 15 जुलाई 2026 को द तहलका खबर ने इस मामले को दोबारा उठाया। इसके बाद आवास विकास परिषद की ओर से अस्पताल के बेसमेंट को सील किया गया। लेकिन यहीं से एक नया सवाल खड़ा हुआ—अगर विवाद भवन के इस्तेमाल और उसकी वैधानिक स्थिति को लेकर है, तो कार्रवाई केवल बेसमेंट तक सीमित क्यों रही? क्या सिर्फ बेसमेंट सील कर देने से बाकी भवन की वैधानिक स्थिति स्पष्ट हो जाती है?
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद बढ़ी जिम्मेदारी
इसी बीच रिहायशी क्षेत्रों में नियमों के उल्लंघन और अवैध निर्माणों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख ने इस मामले को और महत्वपूर्ण बना दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि “समय बीत जाने से कोई अवैधता वैध नहीं हो जाती।” भोपाल मामले में भी अदालत ने प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए वास्तविक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। 6 अगस्त 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक भोपाल मामले में नगर निगम को स्थिति सुधारने के लिए पांच सप्ताह का समय दिया गया और अगली सुनवाई 15 सितंबर 2026 को निर्धारित है।
इसके बाद 12 अगस्त 2026 को सामने आए सुप्रीम कोर्ट के व्यापक रुख में राज्यों और स्थानीय निकायों को अवैध निर्माणों की पहचान कर कार्रवाई करने तथा आदेशों की अनदेखी पर अवमानना की कार्रवाई की चेतावनी दी गई। ऐसे में अब सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट की इस सख्ती का असर मथुरा में ऐसे मामलों पर किस तरह दिखाई देगा।
12 अगस्त को फायर अधिकारी ने क्या कहा?
मथुरा न्यूरो हॉस्पिटल मामले में सबसे महत्वपूर्ण जानकारी 12 अगस्त 2026 को शाम 5 बजकर 42 मिनट पर सामने आई। द तहलका खबर ने अग्निशमन अधिकारी नरेश कुमार से फोन पर अस्पताल की फायर NOC के संबंध में जानकारी ली।
नरेश कुमार ने कहा कि मथुरा न्यूरो सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल की फायर NOC नहीं है और वह निरस्त हो चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि आवास विकास द्वारा अस्पताल को सील किया जा चुका है।
अगर फायर NOC निरस्त हो चुकी है तो फिर सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य विभाग की भूमिका को लेकर उठता है—अस्पताल का मेडिकल रजिस्ट्रेशन अब तक क्यों बना हुआ है?
CMO कार्यालय से भी जवाब को लेकर सवाल
द तहलका खबर की ओर से अस्पताल के पंजीकरण से जुड़े पटल के अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अनुज चौधरी से इस संबंध में जानकारी लेने का प्रयास किया गया। उन्होंने फोन पर कहा कि अस्पताल की फायर NOC है।
जब पत्रकार ने उन्हें अग्निशमन अधिकारी नरेश कुमार से हुई बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि फायर विभाग की जानकारी इसके विपरीत है और जरूरत पड़ने पर अग्निशमन अधिकारी से फोन पर बात भी कराई जा सकती है, तो डॉ. अनुज चौधरी ने कहा कि वह छुट्टी पर हैं और कार्यालय आने के बाद बात की जाए।
अब सवाल यह है कि स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड में फायर NOC की वास्तविक स्थिति क्या है? कौन-सा दस्तावेज वर्तमान में मान्य है? और अगर फायर NOC वास्तव में निरस्त है, तो अस्पताल के पंजीकरण की समीक्षा क्यों नहीं की जा रही?
17 अगस्त को आवास विकास अधिकारी ने कहा—रेगुलराइज कराने के प्रयास जारी
मामले में 17 अगस्त 2026 को एक और महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई। आवास विकास परिषद के अधिशासी अभियंता सूरजपाल से बातचीत में उन्होंने कहा कि अस्पताल को रेगुलराइज कराने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
लेकिन यहां भी कानूनी स्थिति को लेकर सवाल उठता है। यदि भवन के खिलाफ पुराना ध्वस्तीकरण आदेश मौजूद है और भवन निर्माण एवं सेटबैक से जुड़े नियमों का अनुपालन नहीं हुआ है, तो क्या केवल रेगुलराइजेशन का प्रयास शुरू कर देने से वर्तमान स्थिति स्वतः वैध हो जाती है?
इसकी वास्तविक स्थिति संबंधित प्राधिकरण के रिकॉर्ड और लागू कानून के आधार पर स्पष्ट होनी चाहिए।
एक तरफ ध्वस्तीकरण आदेश, दूसरी तरफ सम्मान
इस मामले का एक और पहलू भी सवाल खड़े करता है। 27 फरवरी 2026 को आयोजित एक कार्यक्रम में जिलाधिकारी चंद्र प्रकाश सिंह द्वारा मथुरा न्यूरो हॉस्पिटल के संचालक मनोज रघुवंशी को सम्मानित किए जाने का उल्लेख सामने आया है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब भवन और अस्पताल की वैधानिक स्थिति को लेकर प्रशासनिक स्तर पर सवाल मौजूद थे, तो क्या सम्मान से पहले अस्पताल की सभी वैधानिक अनुमतियों और भवन की स्थिति का सत्यापन कराया गया था?
2022 में बिना फायर NOC पांच अस्पतालों पर हुई थी कार्रवाई
स्वास्थ्य विभाग की भूमिका को लेकर सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अक्टूबर 2022 में बिना फायर NOC संचालित पांच अस्पतालों के खिलाफ सीलिंग कार्रवाई की गई थी। उस टीम में डॉ. अनुज चौधरी भी शामिल थे।
ऐसे में सवाल है कि अगर उस समय बिना फायर NOC संचालित अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई संभव थी, तो अब मथुरा न्यूरो हॉस्पिटल की फायर NOC को लेकर अग्निशमन विभाग की ओर से निरस्तीकरण की बात सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की ओर से क्या कार्रवाई की जा रही है?
सूत्रों के आरोपों की भी हो जांच
इस पूरे मामले में सूत्रों के हवाले से यह आरोप भी सामने आया है कि नियमों के विपरीत संचालित कुछ अस्पतालों से स्वास्थ्य विभाग के स्तर पर समय-समय पर लिफाफे, गिफ्ट, मिठाई के डिब्बे, ठंडी चाय पहुंच जाती है और इससे कार्रवाई प्रभावित होती है।
अब सबसे बड़ा सवाल
पूरे मामले में घटनाक्रम को देखें तो 31 मार्च 1997 को ध्वस्तीकरण आदेश, 23 जून 2026 को द तहलका खबर की पहली पड़ताल, 15 जुलाई 2026 को बेसमेंट सीलिंग, 6 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, 12 अगस्त 2026 को शाम 5:42 बजे फायर NOC निरस्त होने की जानकारी और 17 अगस्त 2026 को रेगुलराइजेशन के प्रयास की बात सामने आती है।
अब सवाल यह है कि क्या 1997 के ध्वस्तीकरण आदेश पर कार्रवाई होगी? क्या पूरे भवन की वैधानिक स्थिति की जांच होगी? क्या फायर NOC की वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जाएगी? और यदि फायर NOC वैध नहीं है तो अस्पताल के पंजीकरण पर स्वास्थ्य विभाग नियमानुसार कार्रवाई करेगा?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर भविष्य में इस अस्पताल में कोई अग्निकांड या अन्य गंभीर हादसा होता है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है—समय बीत जाने से अवैधता वैध नहीं हो जाती।
अब देखना यह है कि यह संदेश मथुरा में सिर्फ कागजों तक सीमित रहता है या जमीन पर भी कार्रवाई दिखाई देती है।
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