नए बिल्डिंग बायलॉज पर मथुरा में सुस्ती, नियम बने, लेकिन अमल अब भी नहीं हो रहा है
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मथुरा। जनपद में नए बिल्डिंग बायलॉज लागू होने के महीनों बाद भी प्रशासनिक सुस्ती चर्चा का विषय बनी हुई है। जुलाई 2025 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लागू किए गए नए नियमों का उद्देश्य भवन स्वामियों को राहत देना और आवासीय भवनों में सीमित व्यवसायिक गतिविधियों को वैधता प्रदान करना था, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इन नियमों का प्रभाव अभी तक स्पष्ट रूप से नजर नहीं आ रहा है। विशेष रूप से मथुरा वृंदावन विकास प्राधिकरण और आवास विकास परिषद की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं।
नए बिल्डिंग बायलॉज के अनुसार यदि किसी आवासीय भवन में व्यवसायिक गतिविधि संचालित हो रही है, तो भवन स्वामी को भू-उपयोग परिवर्तन (Land Use Change) के लिए आवेदन करना होगा। इसके बाद भवन का मानचित्र व्यवसायिक मानकों के अनुरूप स्वीकृत कराया जाना अनिवार्य है। साथ ही, यदि भवन का कोई हिस्सा नियमों के अनुरूप नहीं है, तो उसे शमन (Compounding) या आवश्यक संशोधन के जरिए ठीक करना होगा। जिन हिस्सों को शमन के योग्य नहीं माना जाएगा, उन्हें हटाना जरूरी होगा, तभी उस भवन में व्यवसायिक गतिविधि को वैध रूप से जारी रखने की अनुमति मिलेगी।
हालांकि, नियम लागू हुए करीब आठ महीने बीत चुके हैं, लेकिन मथुरा वृंदावन विकास प्राधिकरण के स्तर पर इस दिशा में कोई ठोस पहल नजर नहीं आ रही है। आरोप है कि प्राधिकरण के जिम्मेदार अधिकारी—सचिव आशीष कुमार और उपाध्यक्ष लक्ष्मी एन—इस महत्वपूर्ण विषय पर अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखा रहे हैं। मीडिया द्वारा संपर्क किए जाने पर भी इस मामले में संतोषजनक जवाब नहीं मिल पाया, जिससे स्थिति और अधिक संदिग्ध प्रतीत हो रही है।
दिलचस्प बात यह है कि जहां लखनऊ और उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में इन नियमों के तहत नोटिस जारी कर कार्रवाई शुरू कर दी गई है, वहीं मथुरा में स्थिति लगभग जस की तस बनी हुई है। न तो व्यापक स्तर पर नोटिस जारी किए गए हैं और न ही भू-उपयोग परिवर्तन की प्रक्रिया को तेज़ी से लागू किया गया है।
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि इस ढिलाई के कारण अवैध रूप से संचालित हो रही व्यवसायिक गतिविधियों को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा मिल रहा है। यदि समय रहते इन नियमों को प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया गया, तो शहर की योजनाबद्ध विकास प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और राजस्व का भी नुकसान हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नए बिल्डिंग बायलॉज शहरी विकास के लिए एक सकारात्मक कदम हैं, लेकिन इनका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब संबंधित विभाग समयबद्ध और पारदर्शी तरीके से इनका क्रियान्वयन सुनिश्चित करें।
कुल मिलाकर, मथुरा में नए बिल्डिंग बायलॉज को लेकर बनी यह सुस्ती प्रशासनिक जवाबदेही और कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। अब देखना यह होगा कि संबंधित विभाग कब तक इस दिशा में सक्रिय होकर नियमों को धरातल पर उतारते हैं और शहर को नियोजित विकास की दिशा में आगे बढ़ाते हैं।