धुरंधर, कराची की हिंसा और सीमा पार का अनदेखा यथार्थ
भारतीय सिनेमा जब तक प्रेम, पारिवारिक रिश्तों और कल्पनालोक तक सीमित रहा, तब तक वह सुरक्षित माना गया। लेकिन जैसे ही सिनेमा ने इतिहास, सुरक्षा और सीमा पार की सच्चाइयों को छूना शुरू किया, विवाद उसका स्थायी साथी बन गया। धुरंधर इसी श्रेणी की फिल्म है। यह केवल एक जासूसी या एक्शन फिल्म नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया के उस यथार्थ की ओर इशारा है, जिसे दशकों से या तो नज़रअंदाज़ किया गया या जानबूझकर ढक दिया गया।
फिल्म पर उठे विरोधी स्वरों को समझने के लिए पहले उस पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है, जिस पर इसकी कहानी आधारित है—कराची, ल्यारी और पाकिस्तान का संगठित अपराध।
कराची: अपराध और आतंक का केंद्र
पाकिस्तान का सबसे बड़ा शहर कराची लंबे समय तक एशिया के सबसे हिंसक शहरों में गिना जाता रहा है। स्वतंत्र शोध संस्थानों और पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 2000 से 2015 के बीच कराची में 20,000 से 25,000 लोगों की मौत टारगेट किलिंग, गैंगवार, राजनीतिक हिंसा और आतंकी गतिविधियों में हुई।
केवल 2012 में ही कराची में 3,000 से अधिक हत्याएं दर्ज की गई थीं, जो उस समय दुनिया के कई युद्धग्रस्त क्षेत्रों से भी अधिक थीं।
ल्यारी इलाका इस हिंसा का प्रतीक बन गया था। बाबू बलोच, अरशद पप्पू और बाद में रहमान डकैत जैसे गैंगस्टरों ने वहां समानांतर सत्ता कायम कर ली थी। पुलिस और प्रशासन की पहुंच सीमित थी और कई मामलों में राजनीतिक संरक्षण के आरोप भी लगे।
धुरंधर इसी पृष्ठभूमि में अपराधियों, खुफिया एजेंसियों और सत्ता के गठजोड़ को दिखाती है। यह कल्पना नहीं, बल्कि उस दौर की वास्तविक तस्वीर है।
आईएसआई और अपराध की मिलीभगत का आरोप
पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई पर दशकों से आरोप लगते रहे हैं कि उसने रणनीतिक उद्देश्यों के लिए गैर-राज्य तत्वों और अपराधियों का इस्तेमाल किया।
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, 1980 के दशक से अब तक पाकिस्तान में 70 से अधिक आतंकी संगठनों ने किसी न किसी रूप में गतिविधियां संचालित कीं, जिनमें कई का संबंध अपराध नेटवर्क से भी रहा।
कराची जैसे शहर में हथियारों की खुलेआम उपलब्धता, ड्रग्स और हवाला नेटवर्क ने अपराध को और मजबूत किया। धुरंधर में दिखाई गई यह परतें उस सिस्टम की ओर इशारा करती हैं, जो लंबे समय तक नियंत्रण से बाहर रहा।
पुलिस और सिस्टम की कीमत
फिल्म में एक ईमानदार पुलिस अफसर के संघर्ष की कहानी दिखाई जाती है। यह अकेली कहानी नहीं है।
पाकिस्तान में आतंकवाद और संगठित अपराध के खिलाफ लड़ाई में अब तक 80,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें बड़ी संख्या पुलिस और सुरक्षा बलों की है।
कराची में कई ऐसे अफसर रहे, जिन्होंने गैंगस्टरों के खिलाफ अभियान चलाया और बाद में जान गंवाई।
यह आंकड़े बताते हैं कि फिल्म जिस सच्चाई को दिखाती है, वह केवल कहानी नहीं, बल्कि पूरे समाज की त्रासदी है।
अल्पसंख्यक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
फिल्म में सबसे अधिक विवाद हिंदुओं को लेकर दिखाए गए संवादों पर हुआ। इसे समझने के लिए इतिहास पर नज़र डालनी जरूरी है।
1947 के विभाजन के दौरान हुई हिंसा में लगभग 8 से 10 लाख लोग मारे गए और 1.4 से 1.5 करोड़ लोग विस्थापित हुए।
पाकिस्तान बनने के समय वहां की कुल आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी करीब 15 प्रतिशत थी, जो आज घटकर 1.5 से 2 प्रतिशत रह गई है।
मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, पाकिस्तान में हर साल 1,000 से अधिक अल्पसंख्यक लड़कियों के जबरन धर्म परिवर्तन और विवाह के मामले सामने आते हैं। यह आंकड़ा बताता है कि अल्पसंख्यकों की स्थिति आज भी असुरक्षित बनी हुई है।
ऐसे माहौल में हिंदुओं को कमजोर या असुरक्षित मानने की सोच विकसित होना कोई अचानक पैदा हुई मानसिकता नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सामाजिक प्रक्रिया का परिणाम है। फिल्म इसी सोच को उजागर करती है, उसका समर्थन नहीं करती।
भारत-पाक रिश्ते और सामाजिक मनोविज्ञान
भारत और पाकिस्तान के रिश्ते केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक भी हैं।
पाकिस्तान में किए गए कई सर्वे बताते हैं कि भारत के प्रति नकारात्मक धारणा 60 से 70 प्रतिशत आबादी में मौजूद रही है, खासकर संघर्ष और युद्ध के बाद के दौर में।
इसके बावजूद व्यक्तिगत स्तर पर पाकिस्तानी समाज में मेहमाननवाज़ी और मानवीय व्यवहार भी देखने को मिलता है। यह दोहरा चरित्र ही फिल्म के कथानक की आत्मा है—जहां एक ओर इंसानियत है, वहीं दूसरी ओर नफरत और हिंसा भी।
सिनेमा, राजनीति और बौद्धिक असहजता
धुरंधर के विरोध में उठी आवाज़ें इस बात का संकेत हैं कि भारत में एक वर्ग ऐसा है जो हर सीमा पार की सच्चाई को राजनीतिक चश्मे से ही देखता है।
जब कश्मीर, आतंकवाद या पाकिस्तान के सामाजिक यथार्थ पर सवाल उठते हैं, तो उन्हें तुरंत “प्रोपेगेंडा” कहकर खारिज करने की कोशिश होती है।
लेकिन शोध और आंकड़े बताते हैं कि फिल्म जिन मुद्दों को उठाती है, वे लंबे समय से दर्ज सच्चाइयां हैं।
निष्कर्ष
धुरंधर किसी देश, धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि उस सिस्टम के खिलाफ सवाल खड़े करती है जिसने अपराध और आतंक को पनपने दिया।
सिनेमा का काम सच्चाई को सुंदर बनाना नहीं, बल्कि उसे सामने रखना है। और जब सच्चाई असहज हो, तो विरोध होना तय है।
लेकिन इतिहास, आंकड़े और ज़मीनी हकीकत यही कहते हैं कि सीमा पार की यह कहानी कल्पना नहीं, बल्कि एक कड़वा सच है।
इस सच से आंखें चुराने के बजाय, उस पर गंभीर और ईमानदार विमर्श ही लोकतंत्र और पत्रकारिता की असली कसौटी है।
हेमेन्द्र चौधरी
संस्थापक व संपादक
द तहलका खबर व मानवाधिकार फास्ट न्यूज
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