पटाखों की चमक में छिपा धुआं
दीपावली, रोशनी का त्योहार - वह पर्व जो अंधकार पर प्रकाश की जीत का प्रतीक है, जो हमें अच्छाई, उत्साह और मिलन का संदेश देता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस त्योहार की असली भावना कहीं पटाखों के धुएं और शोर में खोती जा रही है। दीपों की कोमल रोशनी और खुशियों की मधुरता अब बारूद की गंध और धमाकों की आवाज़ में दब जाती है।
हर वर्ष दीपावली (दिवाली) पर हम मिलन-उत्सव की भावना, दीयों की रोशनी और मिठाइयों की मिठास के बीच एक ऐसा दृश्य देखते हैं, जो हमारी आँखों को भले ही बहुत सुंदर लगता हो पर उसकी छाया में एक गहरी समस्या भी मौजूद है: वह है वायु एवं ध्वनि प्रदूषण, जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। इस लेख में, पटाखों के उपयोग से होने वाले नुकसान-देह प्रभावों को तथ्यों-आंकड़ों के साथ स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है, ताकि हम इस खुशी के पर्व को सचमुच रोशनी के रूप में मनाने का विकल्प चुन सकें न कि उस रोशनी के साथ आने वाले धुएँ-कणों का बोझ उठाते हुए।
पटाखे जलाना सदियों पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि आधुनिक दिखावे की प्रवृत्ति है। दीपावली के असली अर्थ में "दीप" का मतलब है—प्रकाश, पवित्रता, शांति और आत्मज्ञान। किंतु आज यह पर्व पर्यावरण के लिए संकट बन गया है। हर साल दीपावली के बाद वायु प्रदूषण का स्तर खतरनाक सीमा पार कर जाता है। दिल्ली, नोएडा, पटना, कानपुर जैसे शहरों में हवा में जहरीले तत्वों का स्तर इतना बढ़ जाता है कि सांस लेना मुश्किल हो जाता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, दीपावली के बाद बच्चों और बुजुर्गों में सांस की बीमारियाँ, अस्थमा के दौरे, आंखों में जलन और त्वचा संबंधी रोग तेजी से बढ़ जाते हैं। जानवरों और पक्षियों पर भी इन शोरगुल वाले पटाखों का गहरा असर पड़ता है।
यह सही है कि त्यौहार उत्सव का नाम है, लेकिन किसी उत्सव की खुशी तब तक सार्थक नहीं जब तक वह किसी और के दुख का कारण न बने। अगर हमारी खुशियां प्रकृति के नुकसान पर टिकेंगी, तो यह त्योहार नहीं, त्रासदी का आरंभ होगा।
कई राज्य सरकारों ने पटाखों पर प्रतिबंध लगाने या ग्रीन क्रैकर्स को प्रोत्साहित करने के प्रयास किए हैं, लेकिन इन आदेशों का पालन अभी भी आधे-अधूरे मन से होता है। समाज में जागरूकता और आत्मसंयम की भावना तभी विकसित होगी जब हर व्यक्ति समझे कि “हर जलते पटाखे के साथ एक सांस कम हो रही है।”
- पटाखों का उपयोग और उत्सव की परंपरा
दिवाली पर पटाखों का प्रचुर उपयोग अपनी संस्कृति और आनंद के कारण लोकप्रिय हुआ है। हालांकि, यह ध्यान देने योग्य है कि पटाखों से निकलने वाला धुआँ, कण (Particles) तथा ध्वनि स्वयं-में एक पर्यावरणीय और स्वास्थ्य-चुनौती बन चुका है। उदाहरण के लिए, पटाखों से निकलने वाले सूक्ष्म कण जैसे पीएम₂.₅ (2.5 माइक्रोन से छोटे कण) सीधी तरह से हमारी फेफड़ों व स्वास्थ्य पर असर डालते हैं।
पिछले वर्षों में सरकार-संस्थान यह दिशा-निर्देश दे चुके हैं कि पटाखों का उपयोग सीमित समय में किया जाए, “ग्रीन पटाखे” (कम प्रदूषण वाले) प्रोत्साहित किये जाएँ, और अधिक नारंगी-शबाब या विस्फोटक ध्वनि वाले पटाखों से बचा जाए। - प्रदूषण के आंकड़े
(क) वायु गुणवत्ता में वृद्धि
• एक रिपोर्ट बताती है कि पूर्वी उत्तर भारत (विशेष रूप से दिल्ली–एनसीआर, उत्तर प्रदेश, हरियाणा क्षेत्र) में दिवाली की रात PM₂.₅ स्तर को राष्ट्रीय वातावरणीय मानकों की तुलना में उच्चतम रूप से 875% तक ज्यादा पाया गया है।
• एक अध्ययन में पाया गया कि पटाखों जलने वाले समय में PM₂.₅ के स्तर कई गुना बढ़ जाते हैं; उदाहरणस्वरूप, दिल्ली में पुरानी ‘दिवाली प्रभाव’ का जायजा लेते हुए कहा गया कि पटाखों से वायु प्रदूषण में “छोटा लेकिन सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण” वृद्धि होती है।
• 2023 एवं 2024 के अध्ययन-डेटा में देखा गया है कि दिवाली के बाद PM₂.₅ µg/m³ के स्तर में तेज उछाल आता है: उदाहरण के लिए, एक अध्ययन में 2023 में दिवाली के एक दिन बाद PM₂.₅ = 115.4 µg/m³ दर्ज हुआ जबकि दिवाली के दूसरे दिन यह फिर घटकर ~74.4 µg/m³ हो गया।
• वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) के संदर्भ में, दिवाली के बाद दिल्ली में कई स्टेशन ‘खतरनाक’ श्रेणी में जा चुके हैं।
(ख) स्रोत-विश्लेषण एवं पटाखों का योगदान
• एक स्रोत विश्लेषण ने यह सामने रखा है कि पटाखों से निकलने वाले कण विशेष तत्वों जैसे (बैरीयम), (पोटैशियम) आदि के रूप में मौजूद रहे, और पटाखों से निकलने वाला PM₂.₅ दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में अन्य स्रोतों की तुलना में अत्यधिक था।
• हालांकि, यह स्पष्ट है कि दिवाली के समय वायु प्रदूषण की पूरी वृद्धि सिर्फ पटाखों की वजह से नहीं होती — अन्य स्रोत जैसे कृषि-उत्तर (खरपतवार व पुआल जलाना), वाहन उत्सर्जन, मौसमीय परिस्थितियाँ (जूमलने की प्रवृत्ति, वायु का कम चलना) भी भूमिका निभाते हैं।
(ग) स्वास्थ्य-प्रभाव
• सूक्ष्म कण (PM₂.₅) हमारे फेफड़ों के गहरे भाग तक पहुँच सकते हैं और श्वसन रोग, अस्थमा, हृदय संबंधी जोखिम वृद्धि का कारण बन सकते हैं।
• दिवाली के दौरान/तत्पश्चात वायु प्रदूषण बढ़ने से विशेष रूप से बच्चों, वृद्धों, श्वसन-विकारों वाले लोगों पर प्रतिकूल असर पड़ता है — जैसे आंखों में जलन, गले में खराश, सांस लेने में कठिनाई आदि। - आंकड़े और स्थिति
• दिवाली से पहले ही उत्तर प्रदेश के कई शहरों में वायु गुणवत्ता बहुत ख़राब स्थिति में पाई गई। उदाहरणस्वरूप, रिपोर्ट के अनुसार गाजियाबाद का एक्यूआई 333, नोएडा का 329, हापुड का 306 तथा बागपत का 300 निर्धारित हुआ — ये आंकडे दिल्ली की तुलना में भी बदतर थे।
• अध्ययन-रिपोर्ट में यह देखा गया है कि दिवाली की रात पटाखों के कारण PM2.5 (2.5 माइक्रोन से छोटे वायु कण) का स्तर राष्ट्रीय मानदंडों (NAAQS) से कहीं तक 875 % तक अधिक हो जाता है — जिसमें उत्तर प्रदेश भी शामिल है।
• एक विशेष अध्ययन में लखनऊ शहर में दिवाली-रात्रि के दौरान PM2.5, PM10, NO₂ व SO₂ में भारी उछाल पाया गया। “पौल्यूशन के मुख्य स्रोतों” में पटाखों की भूमिका स्पष्ट दिखी।
• सरकारी आदेशों के अनुसार, उत्तर प्रदेश की एनसीआर जिले (जैसे मेरठ, गाजियाबाद, गाजियाबाद-पास वाले जिलों) में पैडलॉक-प्रकार से पटाखों के निर्माण, भंडारण, बिक्री व उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया है।
विश्लेषण
• उपरोक्त आंकड़े दिखाते हैं कि उत्तर प्रदेश में दिवाली के समय वायु-प्रदूषण में सिर्फ पटाखों का हिस्सा ही नहीं बल्कि पूर्व-मौसमी वायु दशा, वाहन-उत्सर्जन, कृषि अवशेष जलाना (स्टबल बर्निंग) आदि का भी योगदान है। उदाहरणस्वरूप, पर-कृषि बचे पुआल आदि उत्तर भारत में बड़े पैमाने पर जलाए जाते हैं, जो वायु गुणवत्ता को पहले ही कमजोर बना देते हैं।
• जब एक्यूआई पहले से ही खराब है, और ऊपर से पटाखों का धुआँ-कण जुड़ जाता है — तब स्थिति तुरंत “बहुत खराब/बहु खतरनाक” श्रेणी में पहुँच जाती है। इससे स्वास्थ्य-जोखिम तुरंत बढ़ जाते हैं, खासकर बच्चों, बुजुर्गों व श्वसन विकार वाले व्यक्तियों में।
• प्रतिबंध और नियम तो हैं — लेकिन उनके अमल-प्रभाव में चुनौतियाँ हैं, जैसे अवैध पटाखों की बिक्री, सीमित निरीक्षण-संरचना, सार्वजनिक जागरूकता की कमी।सुझाव
उत्तर प्रदेश में इस समस्या को घटाने के लिए निम्नलिखित सुझाव प्रणालियाँ उपयोगी हो सकती हैं:
• दिवाली-उत्सव में ग्रीन पटाखों (कम प्रदूषण उत्पन्न करने वाले) के उपयोग को प्रोत्साहित करना — और पारंपरिक पटाखों की बिक्री-उपयोग पर सख्त निगरानी।
• पटाखों के उपयोग का सीमित समय-विंडो तय करना — जैसे शाम के बाद एक निश्चित अवधि तक — ताकि देर रात तक अत्यधिक उत्सर्जन न हो।
• जागरूकता अभियानों को बढ़ावा देना — यह बताया जाना चाहिए कि पटाखों के धुएँ का प्रभाव सिर्फ उस रात नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व पर्यावरण पर विस्तारित हो सकता है।
• मास्क-उपयोग, घरों में वायु-शुद्धिकरण व खुली-हवा वाले स्थानों में दिवाली मनाने जैसे स्वास्थ्य-सुरक्षा सुझाव देना।
• राज्य व स्थानीय प्रशासन द्वारा निरीक्षण व दंडात्मक कार्रवाई को प्रभावी बनाना — जैसे अवैध भंडारण या बिक्री के विरुद्ध कार्रवाई। - पटाखों के विकल्प और सुधार-प्रस्ताव
अब जब आंकड़े साफ-साफ ये संकेत देते हैं कि पटाखों से जुड़ी गतिविधियाँ माहौल-प्रदूषण में गहरे असर डालती हैं, तो हमें यह सोचना होगा कि हम अपनी परंपराओं को कैसे सुरक्षित, स्वस्थ व पर्यावरण-अनुकूल रूप से कर सकते हैं।
• ग्रीन पटाखों का विकल्प: वैज्ञानिक-संस्थाओं ने विकास किया है ऐसे पटाखों का जो पारंपरिक पटाखों की तुलना में 30-50% तक कम प्रदूषण उत्पन्न करते हैं।
• समय व स्थान का नियंत्रण: पटाखे केवल तय समय (उदाहरण के लिए देर शाम 8-10 बजे) व खुली जगह पर जलाए जाएँ, ताकि अन्य लोगों/बच्चों/बुजुर्गों पर न्यूनतम जोखिम हो।
• दीप-मालाएं, रंगोली, सांस्कृतिक कार्यक्रम पर अधिक जोर दें: पटाखों की जगह दीयों, लेज़र-लाइट, संगीत-नृत्य आदि विकल्प अपनाना कि क्यों न?
• जन-जागरूकता व नियमों का कड़ाई से पालन: सरकारों/निगमों द्वारा पटाखों की बिक्री-उपयोग पर नियंत्रण, निरीक्षण व उल्लंघन पर प्रभावी दंड व्यवस्था जरूरी है।
दिवाली का संदेश सदियों-से “अंधकार पर प्रकाश की जीत”, “अहंकार पर भक्ति” और “अकेले न, मिलकर मनाएँ” का रहा है। लेकिन जब इस प्रकाश-उत्सव में प्रदूषण का बोझ जुड़ जाए, तब वह रोशनी वास्तव में हमारे स्वास्थ्य व पर्यावरण पर भारी पड़ने लगती है। इसके कारण हमारी खुशियाँ, जितनी विशाल दिखती हैं, उतनी ही अल्प-कालीन व संशय-पूर्ण हो जाती हैं।
इसलिए, हमें इस दिवाली पर यह संकल्प लेना होगा कि हम जागरूक — दायित्वपूर्ण — पर्यावरण-अनुकूल तरीके से उत्सव मनाएँगे। पटाखों से निकलने वाला धुआँ सिर्फ हमारी आँखों को नहीं छोड़ेगा— वह हमारे फेफड़ों, बच्चों की सांसों, बुजुर्गों के स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों की वायु-शुद्धि को छू जाएगा।
इस दिवाली, हम दीप जलाएँ — लेकिन धुएँ नहीं, पटाखों की बजाय प्रेम-प्रकाश लेकर आएँ। तभी वास्तव में “रोशनी” का अर्थ पूरा होगा।
अब समय है कि हम दीपावली को उसकी मूल भावना के साथ मनाएं—दीयों, मिठाइयों, प्रेम और करुणा के साथ। बच्चों को यह सिखाने की जरूरत है कि असली खुशी आसमान में उठते धुएं से नहीं, अपनों के चेहरों पर खिलती मुस्कान से आती है।
प्रकाश का यह पर्व हमें यह संदेश देता है कि दुनिया को उजाला पटाखों से नहीं, बल्कि हमारी सोच, व्यवहार और करुणा से मिलेगा। आइए, इस बार दीपावली पर संकल्प लें—प्रकृति के प्रति संवेदनशील बने रहें, क्योंकि जब हवा शुद्ध होगी तभी दीये सच में चमकेंगे।
हेमेन्द्र चौधरी
संस्थापक व संपादक
द तहलका खबर एवं मानवाधिकार फास्ट न्यूज
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