क्या GDA में चलता है सेटिंग का खेल? बिना सैटबैक आवासीय निर्माण व्यावसायिक गतिविधी, सील के बाद भी मिली राहत
वीरेन्द्र पांडेय और आलोक रंजन सवालों के घेरे में
गाजियाबाद के कौशांबी स्थित भवन संख्या बी-06 को लेकर सामने आए दस्तावेज़ों ने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूत्रों से मिली जानकारी में बताया गया है कि पूरे प्रकरण में अवर अभियंता वीरेन्द्र कुमार पांडेय और अधिशासी अभियंता आलोक रंजन की भूमिका संदेह के घेरे में है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि जिस भवन को सील किया गया और बाद में शपथ पत्र के आधार पर राहत दी गई, उस भवन में नियमानुसार सैटबैक (Setback) भी उपलब्ध नहीं है। यानी भवन निर्माण में भवन उपविधियों (Building Bye-laws) का भी पूर्ण रूप से उल्लंघन किया गया है।
क्या है पूरा मामला?
दस्तावेज़ों के अनुसार कौशांबी स्थित भवन संख्या बी-06 में कथित रूप से आवासीय भवन में व्यावसायिक गतिविधि (होटल संचालन) की अजहर अहमद द्वारा शिकायत की गई थी। इसके आधार पर 19.03.2024 को प्राधिकरण द्वारा भवन के ऊपरी दो तल सील कर दिए गए।
इसके बाद भवन स्वामी अंकित जालान द्वारा शपथ पत्र दिया गया कि भवन का उपयोग केवल आवासीय रहेगा और भविष्य में किसी भी प्रकार का व्यावसायिक संचालन नहीं किया जाएगा।
शपथ पत्र के आधार पर अधिशासी अभियंता आलोक रंजन प्रवर्तन जोन-6 द्वारा दिनांक 16/08/2024 को सील खोलने का आदेश जारी किया गया, जिस पर अधिशासी अभियंता आलोक रंजन के हस्ताक्षर दर्ज हैं।
इसके शिकायतकर्ता द्वारा जिलाधिकारी को अवगत कराया गया तो बाद में जिलाधिकारी कार्यालय गाजियाबाद द्वारा 05.08.2025 और 02.09.2025 को नोटिस जारी कर दस्तावेज़ व एनओसी मांगी गई, जिससे पूरे मामले में विरोधाभास सामने आया।
बिना सैटबैक भवन को कैसे मिली राहत?
जानकारी के लिए बता दें कि उक्त भवन में सैटबैक (खाली जगह) नियमानुसार नहीं छोड़ा गया है, जबकि किसी भी आवासीय या व्यावसायिक भवन के निर्माण में सैटबैक अनिवार्य होता है।
सैटबैक का उद्देश्य अग्नि सुरक्षा सुनिश्चित करना, वेंटिलेशन और प्रकाश की व्यवस्था अच्छे तरीके से होना, आपातकालीन निकासी मार्ग उपलब्ध कराना व भवनों के बीच सुरक्षित दूरी बनाए रखना। यदि भवन में सैटबैक नहीं है, तो यह सीधे-सीधे भवन उपविधियों का गंभीर उल्लंघन माना जाता है।
ऐसे में सवाल उठता है कि:
- क्या अवर अभियंता वीरेन्द्र कुमार पांडेय ने मौके पर जांच की?
- क्या रिपोर्ट में सैटबैक उल्लंघन का उल्लेख किया गया?
- यदि उल्लंघन था तो सील खोलने की संस्तुति कैसे दी गई?
अवर अभियंता वीरेन्द्र कुमार पांडेय की भूमिका पर सवाल
शिकायतकर्ता अजहर अहमद द्वारा जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत दर्ज की गयी जिसका निस्तारण असंतुष्टीपूर्ण किया गया व गलत तरीके से किया गया। मौके की जांच और रिपोर्ट तैयार करने की जिम्मेदारी अवर अभियंता स्तर पर होती है। यदि भवन में सैटबैक नहीं छोड़ा गया, तो यह एक बड़ा तकनीकी उल्लंघन है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जब अवर अभियंता द्वारा उक्त स्थल का निरीक्षण किया गया होगा तो क्या वीरेन्द्र पांडेय को सैटबैक या मानचित्र विपरीत निर्माण नहीं दिखा होगा या जानबूझकर अनदेखा कर दिया गया होगा या फिर किसी खास वजह के कारण देखना बंद कर दिया।
सवाल उठता है कि क्या वास्तविक स्थिति की जांच की गई? क्या रिपोर्ट में उल्लंघन को छुपाया गया? क्या किसी दबाव में रिपोर्ट तैयार की गई?
अधिशासी अभियंता आलोक रंजन की स्वीकृति भी संदेह के घेरे में
सील खोलने का आदेश अधिशासी अभियंता स्तर से जारी हुआ। ऐसे में यह जानना आवश्यक है कि, क्या आलोक रंजन ने उक्त निर्माण स्थल का निरीक्षण करना जरूरी नहीं समझा? क्या इनको उत्तर प्रदेश नगर योजना विकास अधिनियम की जानकारी नहीं है? क्या तकनीकी रिपोर्ट का परीक्षण किया गया? क्या भवन उपविधियों के उल्लंघन को नजरअंदाज किया गया? क्या केवल शपथ पत्र के आधार पर राहत दे दी गई? यदि ऐसा हुआ तो यह प्रशासनिक प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। इसके साथ ही निर्माण स्वामी से संलिप्तता की ओर इशारा करता है।
RTI में भी स्पष्ट जानकारी नहीं
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मांगी गई जानकारी में भी कई बिंदुओं पर स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं बताया गया। इससे यह संदेह और गहरा हो जाता है कि फाइलों में पूरी प्रक्रिया के दस्तावेजों को पारदर्शी तरीके से उपलब्ध नहीं कराया गया है।
प्रशासन और जीडीए कठघरे में
पूरा मामला कई गंभीर सवाल खड़े करता है:
- बिना सैटबैक भवन का निर्माण कैसे हुआ?
- क्या प्राधिकरण के अधिकारियों ने निर्माण के समय निरीक्षण नहीं किया?
- क्या अवर अभियंता वीरेन्द्र कुमार पांडेय की रिपोर्ट निष्पक्ष थी?
- क्या अधिशासी अभियंता आलोक रंजन ने नियमों की अनदेखी की?
- सील खोलने और बाद में नोटिस जारी करने में विरोधाभास क्यों?
- क्या यह मिलीभगत का मामला है?
इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि भवन निर्माण में भवन उपविधियों का उल्लंघन क्यों हुआ ? सैटबैक न होने के बावजूद राहत कैसे दी गई ? किन अधिकारियों की क्या भूमिका रही ? क्या नियमों को दरकिनार किया गया ?
यदि समय रहते जांच नहीं हुई तो यह मामला न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता बल्कि आम जनता की सुरक्षा से भी जुड़ा गंभीर विषय बन सकता है।
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