डीग गेट चौकी के साये में सट्टे का खेल: सबूतों के बाद भी खामोश क्यों है पुलिस?
राहुल शर्मा (क्राइम रिपोर्टर)
मथुरा। डीग गेट पुलिस चौकी से चंद कदम दूर अर्जुनपुरा की गलियों में हर शाम किस्मत के नाम पर बर्बादी का बाजार सजता है। अवैध सट्टे का खेल ऐसे चल रहा है, मानो कानून ने खुद आंखों पर पट्टी नहीं, बल्कि मोटा परदा डाल लिया हो।
सवाल सीधा है — जब सबको पता है कि शाहिद नाम का व्यक्ति खुलेआम सट्टा चला रहा है, तो पुलिस को क्यों नहीं दिखता? या फिर दिखता है, पर देखना नहीं चाहती?
पहले भी खबर प्रकाशित हुई। लोगों को उम्मीद थी कि इस बार पुलिस कार्रवाई करेगी, अड्डा बंद होगा, मजदूरों की कमाई बचेगी। लेकिन हुआ क्या? शाम ढली, पर्चियां कटीं, दांव लगे, और पुलिस नदारद रही।
क्या यह महज लापरवाही है? या फिर चुप्पी के पीछे कोई और कहानी है?
गरीब की जेब, सट्टेबाज की जीत
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस खेल में हार कौन रहा है?
वही मजदूर जो दिनभर पसीना बहाता है। वही पिता जिसके बच्चे घर पर इंतजार करते हैं कि आज कुछ अच्छा खाने को मिलेगा।
लेकिन अर्जुनपुरा की गलियों में बैठा सट्टा उसका सपना निगल जाता है। घर लौटता है तो जेब खाली, आंखें झुकी हुई, और घर में कलह।
क्या पुलिस को यह नहीं दिखता कि यह सिर्फ जुआ नहीं, बल्कि गरीब की रोटी पर डाका है?
फोन हुए, सूचना दी गई… फिर भी खामोशी क्यों?
7 फरवरी 2026 को एस पी सिटी को दूरभाष पर सूचना दी गई। एक मिनट दो सेकेंड बातचीत हुई।
कार्रवाई? शून्य।
8 जनवरी 2026 को थाना प्रभारी गोविंद नगर को अवगत कराया गया। एक मिनट 25 सेकेंड बात हुई। जवाब मिला — “दिखवाते हैं।”
क्या दिखा? किसने देखा? और क्या कार्रवाई हुई?
16 जनवरी को तो हद ही हो गई। चौकी इंचार्ज रिंकेश शर्मा के सामने एक लड़के को भेजकर सट्टा लगवाया गया। पर्ची दिखाई गई। फोटो तक खींचा गया।
जब सबूत सामने था, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
क्या फोटो सिर्फ मोबाइल में सुरक्षित रखने के लिए था, या कार्रवाई की शुरुआत के लिए?
क्या छोटे पकड़े जाते हैं, बड़े बच जाते हैं?
इलाके में चर्चा है कि कभी-कभार छोटे सट्टेबाज या गुर्गे पकड़ लिए जाते हैं, ताकि कागजों में कार्रवाई दर्ज हो सके।
लेकिन असली सरगना हर बार बच निकलता है।
क्या कानून का शिकंजा सिर्फ कमजोरों के लिए है?
क्या अर्जुनपुरा में कानून का वजन नाम देखकर तय होता है?
पुराना दाग, नई कहानी
गोविंद नगर थाना क्षेत्र पहले भी सट्टा और जुए के मामलों में चर्चित रहा है। पुलिसकर्मियों की मिलीभगत सामने आने पर निलंबन तक हुए।
फिर वही क्षेत्र, फिर वही खेल, फिर वही चुप्पी।
क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
या फिर व्यवस्था ने सबक लेना ही छोड़ दिया है?
अब जवाब कौन देगा?
क्या डीग गेट चौकी की नाक के नीचे चल रहे इस धंधे से पुलिस अनजान है?
या फिर यह अनजान बन जाने की कला है?
उच्चाधिकारी क्यों मौन हैं?
जब सूचनाएं, कॉल रिकॉर्ड, प्रत्यक्ष प्रमाण सब मौजूद हैं, तो कार्रवाई की फाइल अभी तक क्यों नहीं खुली?
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