‘हलाल’ पर हलचलः आस्था, अर्थव्यवस्था और राजनीति के संगम पर खड़ा सवाल
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा ‘हलाल प्रमाणन’ वाले उत्पादों के बहिष्कार का आह्वान देशव्यापी बहस का कारण बन गया है। योगी ने इसे आतंकवाद, धर्मांतरण और लव जिहाद जैसी गतिविधियों से जोड़ते हुए कहा कि इस प्रमाणन के माध्यम से भारत की जनसंख्या संरचना बदलने की इस्लामी साजिश चल रही है।
बिहार में चुनाव का मौसम है और योगी भाजपा के स्टार प्रचारक हैं, ऐसे में इस बयान के सियासी मायने भी गहरे हैं। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या ‘हलाल प्रमाणन’ वास्तव में एक साजिश है या फिर यह एक धार्मिक-आर्थिक तंत्र है, जिसे गलत समझा जा रहा है?
‘हलाल प्रमाणन’ की पृष्ठभूमि
‘हलाल’ अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है अनुमति-प्राप्त या वैध। इस्लामी मान्यताओं के अनुसार, भोजन या अन्य उत्पादों में सूअर, शराब या किसी हराम पदार्थ का प्रयोग वर्जित है। इसी की जांच-पर कर प्रमाणन दिया जाता है।
भारत में ‘हलाल प्रमाणन’ की शुरुआत 1974 में मांस उत्पादों से हुई थी, लेकिन 1993 के बाद यह दूध, दही, तेल, मसाले, बिस्कुट, चिप्स, यहां तक कि कॉस्मेटिक और दवाओं तक फैल गया।
आज भारत में चार प्रमुख संस्थाएं ‘हलाल प्रमाणन’ देती हैं-
जमीयत उलेमा-ए-हिन्द
हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (चेन्नई)
जमीयत उलेमा-ए-महाराष्ट्र
हलाल सर्टिफिकेशन सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (मुंबई)
ये सभी इस्लामी संस्थाएं हैं और भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रलय से अधिकृत हैं। इनके प्रमाणपत्र के बिना किसी उत्पाद को इस्लामी देशों में निर्यात नहीं किया जा सकता।
आर्थिक परिप्रेक्ष्य
भारत का हलाल उद्योग केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी विशाल है।
आईएमएआरसी रिपोर्ट (2024) के अनुसार, वैश्विक ‘हलाल खाद्य बाजार’ का आकार 2-7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक है।
भारत का ‘हलाल अर्थतंत्र’ अनुमानतः 8 से 10 लाख करोड़ तक पहुँच चुका है।
भारतीय कंपनियां हर साल प्रमाणन शुल्क के रूप में 60,000 करोड़ रूपये से अधिक का भुगतान करती हैं।
भारत में लगभग 3200 उत्पाद ऐसे हैं जो ‘हलाल प्रमाणित’ हैं।
यह उद्योग निर्यात-केंद्रित भी है, क्योंकि इस्लामी देशों में बिना ‘हलाल प्रमाणन’ के उत्पाद स्वीकार नहीं किए जाते।
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और केरल जैसे राज्य इस प्रमाणन वाले मांस और खाद्य उत्पादों के प्रमुख निर्यातक हैं। उत्तर प्रदेश से हर साल 16,000 करोड़ रूपये से अधिक का मांस और संबंधित उत्पाद विदेश भेजे जाते हैं, जिनमें अधिकांश पर ‘हलाल’ की मुहर होती है।
सामाजिक और राजनीतिक सन्दर्भ
योगी आदित्यनाथ ने 2023 में उत्तर प्रदेश में ‘हलाल प्रमाणन’ को प्रतिबंधित कर दिया था।
उनका तर्क था कि इस प्रक्रिया से प्राप्त धन देशविरोधी गतिविधियों और धर्मांतरण में लगाया जा रहा है।
हालांकि, केंद्र सरकार ने इस विषय में अब तक कोई जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की है।
बिहार चुनाव के मद्देनजर, योगी का यह बयान भाजपा के पारंपरिक ‘हिंदुत्व एजेंडे’ को सशक्त करने वाला माना जा रहा है।
बीते कुछ वर्षों में धार्मिक प्रतीकों और उपभोक्ता विकल्पों पर इस तरह की बहसें चुनावी मंचों पर बार-बार उठी हैं।
उत्तर प्रदेश में ‘हलाल’ को धर्मांतरण से जोड़ना राजनीतिक दृष्टि से ‘ध्रुवीकरण’ का नया बिंदु बनता दिख रहा है।
संवेदनशील प्रश्न
यदि ‘हलाल’ प्रमाणन में कोई अवैध या आतंकी वित्तपोषण है, तो केंद्र सरकार ने अब तक इसकी अधिकृत जांच क्यों नहीं कराई?
यदि यह केवल उपभोक्ता-आस्था या धार्मिक पसंद है, तो क्या इसे प्रतिबंधित करना संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन नहीं होगा?
और यदि यह केवल निर्यात की तकनीकी शर्त है, तो क्यों न भारत सरकार स्वयं एक सरकारी ‘हलाल बोर्ड’ बनाकर यह प्रमाणन दे, ताकि पारदर्शिता बनी रहे और धार्मिक संस्थाओं का एकाधिकार टूटे?
राजनीतिक ध्रुवीकरण बनाम आर्थिक अवसर
यह सच है कि ‘हलाल प्रमाणन’ का पैसा काफी बड़ा है और उसमें पारदर्शिता की कमी है, परंतु यह कहना कि यह पैसा आतंकवाद या धर्मांतरण में जा रहा है कृ अब तक किसी ठोस साक्ष्य से सिद्ध नहीं हुआ है।
यह भी सच है कि विश्व के 57 इस्लामी देशों में बिना ‘हलाल’ टैग के कोई उत्पाद बिक ही नहीं सकता, इसलिए भारत की निर्यात-प्रतिस्पर्धा के लिए यह आवश्यक है।
उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में यदि यह प्रतिबंध कायम रहा, तो उसके निर्यात पर प्रभाव पड़ सकता है।
केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, भारत का मांस निर्यात 2024 में लगभग 4.1 बिलियन डॉलर(34,000 करोड़) था जिसमें से अधिकांश ‘हलाल’ सर्टिफाइड था।
यदि राजनीतिक कारणों से इसे रोक दिया जाए, तो हजारों छोटे निर्यातकों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।
संतुलित समाधान की राह
इस बहस का निष्कर्ष न तो केवल धार्मिक होना चाहिए, न ही केवल राजनीतिक।
आवश्यक यह है किः
केंद्र सरकार एक राष्ट्रीय ‘प्रमाणन नियामक प्राधिकरण बनाए,
ताकि ‘हलाल’, ‘जैन सर्टिफाइड’, ‘शाकाहारी सर्टिफाइड’ जैसे सभी प्रकार के धार्मिक प्रमाणन एक पारदर्शी ढांचे में आ सकें।
प्रमाणन संस्थाओं की ऑडिट रिपोर्ट्स सार्वजनिक की जाएं, ताकि धन के प्रवाह की निगरानी हो सके।
निर्यात उद्योग को राजनीतिक विवाद से अलग रखा जाए।
चुनावी भाषणों में धार्मिक प्रतीकों के उपयोग पर चुनाव आयोग को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए।
‘हलाल’ के नाम पर देश में जो राजनीतिक गर्मी फैली है, वह हमारे सामाजिक ताने-बाने के लिए उतनी ही ऽतरनाक है जितनी आर्थिक दृष्टि से नुकसानदेह।
भारत एक बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक राष्ट्र है। यहां ‘हलाल’ या ‘सात्विक’ दोनों के लिए जगह है कृ क्योंकि लोकतंत्र का अर्थ ही विविधता में एकता है।
आवश्यक यह नहीं कि हम ‘हलाल’ को प्रतिबंधित करें, बल्कि यह सुनिश्चित करें कि कोई भी प्रमाणन आर्थिक रूप से पारदर्शी, धार्मिक रूप से संतुलित और राष्ट्रीय हित में हो।
भारत का विकास तब ही संभव है जब धर्म आस्था बने, व्यापार न बने और राजनीति समाज को जोड़ने का माध्यम बने, तोड़ने का नही।
लेखक
डॉ बी पी सिंह
प्रधान संपादक एवं सीएमडी
मानवाधिकार फास्ट न्यूज एवं बी पी मीडिया समूह
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