महंगाई अब चुनावी मुद्दा नहीं रही? या जनता ने उम्मीद करना छोड़ दिया है?
दिल्ली से पटना तक बातचीत के दौरान परिवारों ने बताया कि रसोई का खर्च, स्कूल फीस, दवाएं और बिजली का बिल — सभी में पिछले पांच वर्षों में काफी वृद्धि हुई है। सरकार मुफ्त राशन, उज्ज्वला और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं से राहत देने का दावा करती है, लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि राष्ट्रीय महंगाई आंकड़ों और आम परिवार की "रसोई महंगाई" के बीच एक बड़ा अंतर है। महंगाई एक चुनावी मुद्दा तो है, लेकिन आज के मतदाता पहचान, नेतृत्व और सुरक्षा जैसे मुद्दों को भी महत्व देने लगे हैं।
"पिछले पांच वर्षों में आपके घर का सबसे बड़ा खर्च किस पर बढ़ा है"
हमने यह सवाल दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, भोपाल और पटना के परिवारों, दुकानदारों, छात्रों, गृहिणियों और कामकाजी लोगों से पूछा। लगभग सभी ने विभिन्न शब्दों में एक समान उत्तर दिया—रसोई का बजट अब पहले जैसा नहीं रहा। कुछ ने दूध और सब्जियों की बढ़ती कीमतों का हवाला दिया, तो किसी ने बच्चों की स्कूल फीस और दवाइयों पर चर्चा की, वहीं कुछ ने किराए और बिजली के बिल के बारे में बात की। हालांकि जब हमने उनसे पूछा,
"क्या आप वोटिंग के समय महंगाई को सबसे बड़ा मुद्दा मानते हैं"
तो प्रतिक्रियाएँ उतनी स्पष्ट नहीं थीं। कई लोगों ने कहा कि अब चुनाव केवल महंगाई पर निर्भर नहीं करते, बल्कि यह पहचान, नेतृत्व, सुरक्षा और कल्याण जैसे मुद्दों पर भी केंद्रित हैं।
भारत में पिछली कुछ सालों के दौरान खुदरा महंगाई कई बार भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा निर्धारित 2%–6% के लक्ष्य दायरे के ऊपरी सीमा के करीब या उससे भी ऊपर पहुंच गई है। खाद्य वस्तुओं की कीमतों, खासकर टमाटर, प्याज, दाल, खाद्य तेल और दूध में, लगातार बढ़ोतरी ने आम घरों के मासिक बजट को प्रभावित किया है। वहीं, सरकार का कहना है कि मुफ्त राशन योजना, उज्ज्वला योजना के लाभ, आयुष्मान भारत, किसान सम्मान निधि और कई अन्य सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों ने करोड़ों लोगों को राहत देने का कार्य किया है। सरकार यह भी दावा करती है कि वैश्विक महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाएं इस स्थिति में योगदान दे रही हैं।
कुछ स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों का मानना है कि औसत महंगाई दर और आम लोगों द्वारा अनुभव की जाने वाली "रसोई महंगाई" में काफी अंतर होता है। जबकि राष्ट्रीय आंकड़े आंकड़े स्थिर दिखाई देते हैं, लेकिन एक सामान्य परिवार की रोजमर्रा की खरीदारी का अनुभव इससे अलग होता है।
जब हमने लोगों से उनकी राय जानी, तो एक गृहिणी ने कहा,
"सरकार के आंकड़े चाहे जो भी हों, हर महीने का राशन पहले से महंगा हो रहा है।"
एक ऑटो चालक ने बताया,
"जितनी हमारी आमदनी बढ़ती है, खर्च भी उससे पहले ही बढ़ जाता है।"
वहीं एक युवा पेशेवर का मानना था कि आजकल रोजगार, करियर, और आर्थिक स्थिरता महंगाई से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। दूसरी तरफ, कुछ नागरिकों ने कहा कि उन्हें सरकारी योजनाओं से सहायता मिली है, इसलिए वे केवल कीमतों के आधार पर सरकार का मूल्यांकन नहीं करते। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आज का मतदाता पहले की तुलना में कई मुद्दों को साथ लेकर चलता है। यही वजह है कि महंगाई चिंता का विषय बनने के बावजूद, यह हर चुनाव के लिए सबसे प्रमुख मुद्दा बनी रहती है।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि महंगाई के प्रभाव हर वर्ग पर एक समान नहीं होते। उच्च आय वाले परिवार कीमतों में वृद्धि को काफी हद तक सहजता से सहन कर लेते हैं, जबकि निम्न और मध्यम आय वाले परिवारों के लिए यह वृद्धि शिक्षा, स्वास्थ्य और बचत पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, महंगाई को नियंत्रित करना ही पर्याप्त नहीं है; इसके साथ रोजगार के अवसर, आय में वृद्धि, कृषि आपूर्ति, ईंधन नीति और वेतन वृद्धि को भी देखना होगा। यदि आय की गति कीमतों की वृद्धि से पीछे रह जाती है, तो आर्थिक विकास के दावों का असली लाभ आम लोगों को नहीं मिल पाता। इसलिए, कई विशेषज्ञ यह सुझाव देते हैं|
आख़िर में, हमने लोगों से एक साधारण सवाल पूछा—
"यदि कल चुनाव हो, तो क्या आप महंगाई के चलते वोट डालेंगे?"
जवाबों में भिन्नता थी, लेकिन एक बात समान थी—महंगाई किसी की प्राथमिकता से पूरी तरह ओझल नहीं हुई है। अंतर यह है कि अब यह केवल एकमात्र चुनावी मुद्दा नहीं रह गई है। राजनीतिक एजेंडे में बदलाव आ चुका है, लेकिन घर में खर्च का हिसाब आज भी जरूरी बनता है।
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